भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५१२ आनन्दरामायणे [सर्गः १९

ऐन्द्रयोगो महान्द्य सत्राऽयं वर्णं शुभम् कर्कीटस्थोऽथ चन्द्रोऽस्ति द्वितीयेऽन्तेऽधुनेम ॥३२॥ मासोऽयं चैत्रमासोऽस्ति वसन्तश्च प्रपद्यते। सदा कुरुष्व राज्यं त्वं चिरं निहतकण्टके ॥३३॥ सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। ततोऽद्यापि पठन्त्युच्चैर्द्वादशाम्राश्वलायनान् ॥३४॥ एवं ज्योतिर्विदा गीतं पप्रच्छ रघुनन्दनः। दत्वा तेभ्यो दक्षिणां दद्यात्सार्द्धवस्त्रांस्तदाऽह्लादम् ॥३५॥ ततो गद्यं ययौ वेतन्ब्राह्मणेभ्यो मनोरथान् समग्रे... दंष्ट्रान्स्नातानूपुष्पदान्गन्धवेदयत् ॥३६॥ शमनान्सकलेभ्यश्च दत्त्वाऽभिष्टान्वरं प्रभुः। पुनस्नापयदात्मानं गन्धाद्भिर्गन्धवर्चस्करैः ॥३७॥ एतस्मिन्नन्तरे रामं नापितः प्रयतो जवात्। मुकुरं दर्शयामास रत्नमन्वन्तमोजिनम् ॥३८॥ स्वादर्श ददर्श मुखं रघुनन्दनः। सुश्रोत्रं च सुबिम्बं च रक्तनेत्रसुशोभितम् ॥३९॥ अनुत्तानं मांसलं च स्फुरद्रक्त... । कम्बुग्रीव्यकण्ठं च सुरदं पद्म विभ्रतामुखम् ॥४०॥ प्रसन्नदृक् दृशौ यस्य सुभ्रू त्रिवली... । रत्नग्रन्थान्सुमुकुटं मकुटेन विभूषितम् ॥४१॥ एवं मुखं निरीक्ष्याथ तुतोष विमलं प्रभुः। अयं ययौ नृपमणिर्भूषयन्वैच प्रभुः पुरः ॥४२॥ नत्वा रामं दूतमुखे हविषाऽऽदाय... । ततो रामः शिविकायां स्थित्वा गेहाद्वहिर्ययौ ॥४३॥ ददर्श मागधांश्च बहिश्चरस्थितान् प्रभुः। प्रणम्ये मागधा रामं नत्वा दीर्घस्वरेण वै ॥४४॥ सूर्यवंशभवान्सर्वान्नृपान्संवर्णयन्मुदा । ततस्ते वन्दिनः सर्वे तुष्टुवु रघुनन्दनम् ॥४५॥ नानात्कृतचरित्रैर्व... नम्नमुखे । ततस्ते चारणा गानं प्रचक्रुर्मुदितमनाः ॥४६॥ नटा वेश्याश्च ननृतुर्नानावाद्यपुरःसराः। अन्ये चक्रुर्विनोदांश्च यैः सन्तुष्येच्च राघवः ॥४७॥ ततो निनेदुर्वाद्यानि नववाद्यस्वरा अपि। ततस्तृतीयकक्षायां ददर्श नृपनन्दनः ॥४८॥ वारणेन्द्रांश्च तुरगान् शिविकाश्च रथांस्तथा। नानालंकारयुक्तांश्च वरवस्त्रैः समन्वितान् ॥४९॥

ऐन्द्रयोग है और कर्क राशिमें वैसा चन्द्रमा आजके [दिन] दूसरे स्थानपर है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ यह चैत्रका महीना है, वसन्त ऋतु है आप मंगलपूर्वक राज्य करें और बहुत दिनोंतक इस पृथ्वीतलपर रहें। सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सदा आपका मङ्गलमय दिन होय और कोई किसी प्रकारका दुःख न देय । ३४ ॥ ३५ ॥ इस प्रकार ज्योतिषीके कहे श्लोकोंका मत और उस पश्चात् दक्षिणा देकर विदा करते थे ॥ ३५ ॥ इसके बाद वेदके साथ भली भाँसकी शास्त्रीय पूजाका माहात्म्य कर सबको प्रसन्न करता था ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणोंको वहीं वस्त्रदिश्य सब योग्यौप बाँटकर राजा स्वयं स्नान करते थे ॥ ३७ ॥ इसके अनन्तर नाई आया। यह सुवर्णके चौखटसे सुसज्जित दर्पण रामको दिखाता था ॥ ३८ ॥ उस दर्पणमें रामचन्द्रजी अपना सुन्दर, मुस्कराहट युक्त और कमलके समान नेत्रोंवाला अपना मुख देखने थे ॥ ४० ॥ वह मुख छोटी सी नासिकासे युक्त, बड़ा सुन्दर, गोलाकार, अच्छे अच्छे दन्त-रंगों तथा मणिरत्नोंके युगलके अतिशय शोभायमान एवं तेजोमय था ॥ ४१ ॥ दोनों कपोल ऊंचे थे, सुन्दर भ्रौ त्रिवली अर्थात तीन रेखाएं माथेमें पड़ी थीं। वे सुवर्ण और रत्नोंसे सुशोभित मुकुट मस्तकपर धारण किये थे । ४२ ॥ इस प्रकार अपना मुखमण्डल देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। इसके पश्चात् एक सेवक आया, जिसके हाथोंमें मखमली रूई भरा रहता था। वह धूपदानी रामके सम्मुख रख तथा नमस्कार करके दूतोंके वस्त्रमें प्रभुके सामने बैठ जाया करता था। इसके अनन्तर शिविकामें बैठकर राम घरसे बाहर निकलते थे ॥ ४३ ।। ४४ । बाहरके आँगनमें बागेजन खड़े रहते थे उन्हें राम देखते थे और जब राम को वे देखते तो प्रणाम करके ऊँचे स्वरसे रामके पूर्वपुरुषोंका यश गाने लगते और फिर रामकी स्तुति करते थे ॥ ४५ ॥ ४६ । वे उनके किये रावणवध आदि चरित्रोंका विशद वर्णन करने थे। तदनन्तर चारणगण प्रसन्नमुख होकर नाना गाने और नट तथा वेश्याय नानाप्रकार उस बाजोके तालपर नाचने लगती थीं। कितने ही लोग विनोद करने लगे जिससे कि राम प्रसन्न हों ॥ ४७ । ४८ ॥ इसके बाद कितने ही प्रकारके बाज बजने लगते थे । तब राम दूसरे आँगनसे तीसरेमें पहुँचते थे ॥ ४९ ॥ वहाँ बहुतसे हाथी, घोड़े, पालकियां और