श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १९ ] राघवानन्दम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१३
ततश्च रत्नकक्षायां नृपान्पौरान्सुहृज्जनान् । समागतान्ददर्शनार्थं ददर्श रघुनन्दनः ॥५१॥
ततः पञ्चमकक्षायां पुष्पञ्च पुष्पवाटिकाः । दूतन्ददर्श भोगांश्च शस्त्रहस्तान्सहस्रशः ॥५२॥
दशां च षष्ठकक्षायामश्वाष्ट्राञ्छतशस्तथा । वीरान्ददर्श भोगांश्च प्रबद्धकरसम्पुटान् ॥५३॥
ततः सप्तमकक्षायां ययौ रामः सभां प्रति । शिबिकायाश्चावतीर्य शनैः सिंहासनं ययौ ॥५४॥
सभ्यं कृत्वा नमस्कृत्य सोपानैः स शनैः प्रभुः । सिंहासनमारुरोह वरच्छत्रसुशोभितम् ॥५५॥
दधार छत्रं सौमित्रिश्चामरं भरतस्तदा । शत्रुघ्नो व्यजनं रम्यं पादुके वायुनन्दनः ॥५६॥
सुग्रीवो जलपात्रं च ह्यदर्शं विभीषणः । दधार हस्ते ताम्बूलपात्रं स वालिनन्दनः ॥५७॥
वस्त्रकोशं जाम्बवांश्च दधार वेगवत्तरः । तस्थौ सिंहासने रामः स गृहीतोपबर्हणः ॥५८॥
तस्थौ पृष्ठे लक्ष्मणश्च भरतः सव्यपार्श्वके । शत्रुघ्नोऽथौ वामपार्श्वे पुरतो वायुनन्दनः ॥५९॥
वायव्यकोणे राक्षसस्य सुग्रीवः सन्धिरोऽभवत् । ईशान्य राक्षसेन्द्रः स आग्नेय्यामाङ्गदः स्थितः ॥६०॥
नैर्ऋत्यां जाम्बवांश्चापि दीर्घाः सर्व्व समन्ततः । राघवस्याग्रतो नृपाः सर्वे स्थिताः सम्बद्धपाणयः ॥६१॥
पार्श्वयोस्ते राघवस्य प्रोच्चस्थाने मुनीश्वराः । पुरतो ननृतुः सर्व्वा वारवेश्याः सहस्रशः ॥६२॥
उभौ वीरास्ततो दूताः समाया संस्थिताः क्रमात् । निषेदुहूँनयः सर्वे रामपुत्रौ निषेदतुः ॥६३॥
रात्रिमित्रा निषेदुस्ते तथा राजाज्ञया नृपाः । ये ये मुख्या निषेदुस्ते तथा देशाः सुहृज्जनाः ॥६४॥
अन्योऽन्ये ते स्थिता एव न निषेदुः प्रभोः पुरः । तेषां मध्ये रामचन्द्रः शुशुभेऽनुपमस्तदा ॥६५॥
सेवकाया न निषेदुः सुमन्त्र एव उत्थितवान् । एवं स्थित्वा सभायां स कृत्वा कार्याण्यनेकशः ॥६६॥
नानाकार्येषु बन्धूंश्च पुत्रानाज्ञाप्य राघवः । दृष्ट्वा नाना कौतुकानि पूर्ववद्गृहमाययौ ॥६७॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि गोमुखादीन्यनेकशः । श्रुत्वा वाद्यनिनादांश्च जानकी सम्भ्रमात्पुरः ॥६८॥
रथ खड़े रहते थे। जिनमें अनेक प्रकारके जल्लार लगे रहते और उनसे कपड़ोंका बोहार पड़ा रहता था। ।। ५० ।। इसके बाद उस आँगनमें ठहरते आये हुए उन राजाओं, पुरवासियों और मित्रोंको देखते थे जो वहाँ रामकी प्रतीक्षा में पहले ही से उपस्थित रहा करते थे । ५१ ।। फिर पाँचवीं चौकमे पुष्पकमिश्रान, पुष्पवाटिका तथा वस्त्र धारण किये हजारों सिपा'हियोंको देखते थे ।। ५२ ।। फिर छठीं चौकमे जाकर हाथ जोड़े हुए हजारों वाकसवार वीरोंको देखते थे । ५३ ।। इसके बाद सातवीं चौकमें पहुंचकर अपनी राजसभा में जाते थे। यहाँ पालकीसे उतरकर सिंहासनके पास जाते थे ।। ५४ ।। दृष्टियों और सिंहासनको प्रणाम करके शनैः शनैः सीढ़ियोंसे चढ़कर सिंहासनपर बैठत थे वो वह सिंहासन धवल सुशोभित रहता था ।। ५५ ।। रामके बैठ जाने- पर लक्ष्मण छत्र लेते, भरत चमर लेते, पंखा शत्रुघ्नजी लेकर खड़े होते और हनुमान्जी रामकी चरणपादुका लिये रहते थे। इनके सिवाय सुग्रीव जलकी झारी, विभीषण एक सुन्दर-सा दर्पण, अङ्गद ताम्बूलका पात्र और वस्त्रकी सन्दूक जाम्बवान् लिये रहते थे। राम पीठपर तकिया लगाकर सिंहासनपर बैठते और उनके पीछे लक्ष्मण, दाहिनी ओर भरत, बायीं ओर शत्रुघ्न, सामने पवनकुमार, वायव्य कोणमें सुग्रीव, ईशान कोणमें विभीषण और आग्नेय कोणमे अङ्गद खड़े रहते थे। ५६-६० ॥ नैर्ऋत्य कोणमे जाम्बवान् रहते और बहुतसे पुरवासी चारों ओर खड़े रहते थे। रामचन्द्रजीके आगे सब राजे हाथ जोड़-जोड़कर खड़े रहा करत थे ॥ ६१ ॥ रामके दाहिने बायें दोनों ओर एक ऊँचे आसनपर मुनिगण बैठते थे। सामने हजारों वेश्यायें नाचती थीं ॥ ६२ ॥ इसके बाद वीरगण और फिर दूतगण खड़े रहा करते थे। समस्त ऋषीश्वर तथा दोनों राजकुमार भी आकर अपने-अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ ६३ ॥ रामके मित्र तथा राजे रामके आज्ञा- नुसार बैठते थे। जो नगरके मुख्य निवासी थे वे तथा मित्रगण भी बैठते थे ।। ६४ ।। इनके सिवाय और लोग रामके सामने नहीं बैठते थे, उन्हें खड़े ही रहना पड़ता था। उन सबके बीचमें रामकी एक अनुपम शोभा होती थी । ६५ ।। सेवक आदिम से कोई भी नही बैठता था। उनमें से केवल सुमन्त्र बैठते थे। इस प्रकार सभा मे बैठ और नाना प्रकारके राजकार्य करके भाइयों और बेटोंको कितने ही काम सौंपकर विविध प्रकार-