श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 811 में से
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५१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २०
कन्यामपि तथैकां तेऽहं दास्यामि न संशयः । तदा ते बहुपुत्रैश्च तारुण्यं स्वास्यते न हि ॥ १३७॥ अत स्त्रीणां सहस्राणि षोडशैकशतं पुनः । तथा मुख्याष्टम्यश्च नार्यस्त्वया सह करीम्यहम् ॥१३८॥ तदा बहूनां पुत्राणां स्नुषाणां त्वं सुखं भज । अहं चापि बहुस्त्रीणां तदा सौख्यं भजामि वै ॥१३९॥ इति रामवचः श्रुत्वा तदा सीता स्मितानना । राघव हर्षिता प्राह वाक्चातुर्यं कृतः प्रभो ॥१४०॥ एतल्लक्ष्ण त्वया राम येन रञ्जयसीह माम् । एवं प्रोक्ता मया शिष्य दिनचर्या रमापतेः ॥१४१॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे रामदिनचर्यावर्णनं नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विंशः सर्गः
( भगवान्के विविध अवतार )
श्रीरामदास उवाच
अथैकदा वसिष्ठं हि प्रभाते क्षत्रवोद्भवः । किञ्चित् प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद मुनीश्वर । १ ॥
सर्वं यद्यपि जानामि वाल्मीकेश्च प्रसादतः । तथापि लोकान्सकलान् ज्ञातुं पृच्छामि तेऽद्य हि ॥२।
यदाऽस्माभिर्निद्रायां हि सर्वैर्निद्रा विधीयते । तदा संश्रूयते कर्णे भस्मचक्रस्य वै ध्वनिः ॥ ३ ॥
अमुं मत्संशयं छिन्धि परं कौतूहलं गुरो । लवस्येति वचः श्रुत्वा वसिष्ठस्तमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥
बह्व्यश्च ब्रह्महत्याश्च रावणेन कृताः पुरा । येन देहेन सोऽद्यापि लंकायां ज्वलते लव ॥ ५ ॥
रात्रौ रामहस्तेन वधान्मुक्तिं गतः क्षणात् । रामचिंतनपुण्येन वैरबुद्ध्या कृतेन च ॥ ६ ॥
आत्मना सकलं पापं तेन दग्धं पुरैव हि । देहेन न कृतं तस्य देवानां नमनं पुरा ॥ ७ ॥
सम्मार्जनादिकं कर्म देवागारेऽपि नो कृतम् । न कृता तीर्थयात्रा हि तेन देहेन भक्तितः ॥ ८ ॥
दस बेटे दूँगा । उस समय तुम बहुत सन्तानका भी सुख भोग लेना । १३५ ॥ १३६ ॥ उस समय मै तुम्हे एक कन्या भी दूँगा । इसमे कोई संशय नही है । किन्तु इतना अवश्य होगा कि अधिक सन्तान होनेसे तुम्हारा यौवन ढल जायगा । १३७ ॥ इसी कारण मुझे सोलह हजार एक सौ स्त्रियोके साथ विवाह करना पड़ेगा और तुम्हारे साथ आठ मेरो मुख्य स्त्रियो भी होंगी ॥ १३८ ॥ उस समय तुम बहुतसे पुत्रो और बहुओंका सुख भोगीयो और मै भी बहुतसी स्त्रियोका सुख भोग दूँगा ॥ १३९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर स हाते मुसकाकर कहा— हे प्रभो ! तुमने बातचीत करनेका इतना चतुराई कहाँस सीखा ? जिससे इस तरह मेरा मनोरंजन कर रहे हो । इस तरह रामने बहुत देर तक आपसमे बातें की और दोनों एक दूसरेका आलिङ्गन करके आधी रातके समय सो गये । हे शिष्य ! मैने इस प्रकार तुम्हे रामचन्द्रकी दिनचर्या सुनायी । १४० ॥ १४१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहितं राज्यकाण्डे उत्तरार्धे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥
श्रीरामदास कहने लगे—एक दिन सबेरे लवने वसिष्ठसे कहा कि हे मुनीश्वर ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ उसे आप बताइए । १ । यद्यपि वाल्मीकिजीकी कृपासे मै सब कुछ जानता हूँ । फिर भी संसारी लोगोंको ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आज आपसे पूछ रहा हूँ ॥ २ ॥ जब कि रात्रिमें हम लोग सोते हैं, तब कानमें कोंकणीकी तरह किसकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ ३ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करिए । इसका मुझे बड़ा कौतूहल है । लवकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा— ॥ ४ ॥ रावणने जिस देहसे बहुत सी ब्रह्महत्याएं की थीं हे लव ! वह देह आज भी लंकामे जल रही है ॥ ५ ॥ रामके हाथो वध होने, रामका स्मरण करने और उनके साथ वैरबुद्धि रखनेसे रावण क्षण भरमें मुक्त हो गया । आत्माके सारे पापोंको वह पहले ही जला