श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 538, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २० |
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ततो दैत्यान्यज्ञकर्मसक्तान्दृष्ट्वा पुनस्त्वहम् । कलावग्रे बुद्धरूपं धरिष्याम्यतिमोहनम् ॥५९॥
निजवाक्यैर्मतिंस्तेषां दैत्यानां यज्ञकर्मतः । परावर्त्य कियत्कालं स्थास्यामि जगतीतले ॥६०॥
तदाऽहं मौनमाश्रित्य मलिनः केशलोञ्चकः । यूकादिजीवधारी च सर्वेषामुपदेशकत् ॥६१॥
अहिंसनंवनं सर्वान् दर्शयिष्याम्यहं जनान् । तज्जन्मन्यतिदुःखं मे केशयूकामलादिना । ६२॥
ततोऽग्रेऽहं धरिष्यामि कल्किरूपं महन्मखेः । अंते दृष्ट्वा जनानां च सर्वत्र वर्णसंकरम् ॥६३॥
भूत्वाऽत्र विप्रदेहेन खङ्गधारी हयस्थितः । संहारं क्षणमात्रेण दुष्टानां हि करोम्यहम् ॥६४॥
सोऽवतारो नातिचिरं मम स्थास्यति भूतले । न तत्र सुखलेशोऽपि मे भविष्यति भूसुराः ॥६५॥
प्रवर्तिष्यति पुनस्ततोऽग्रे तत्र कृतं युगम् । पूर्ववच्च पुनस्तत्र ह्यवतारान्करोम्यहम् ॥६६॥
एवं नवावतारेषु न सुखं हि सुखं मया । अतस्त्वस्मिन्नवतारे सुखं भुक्तं यथेच्छया ॥६७॥
नानेन सदृशः कश्चिदवतारोऽवनीतले । पूर्वं भूतो मयाग्रेऽपि न भविष्यति वै कदा ॥६८॥
सप्तलोकाधिपत्यं च नारी सीता च वर्तते । यत्रेमौ बालको पुत्रौ महारथौ धनुर्धरौ ॥६९॥
यत्र श्वेते बंधवश्च त्रैलोक्यजयिनः शुभाः । कामधेन्वादिरत्नानि सप्त यत्र ममान्तिके । ७०॥
साक्षादयं वेदरूपो वसिष्ठस्त्वस्ति मे गुरुः । आर्यावर्ते पुण्यदेशेऽयोध्यायां वसतिर्मम ॥७१॥
राज्यभोगादिभोगानां मत्ताऽऽह म्त्वत्र नोद्भवः । यत्र सत्यव्रतं मेऽस्ति यत्रैकदपिताव्रतम् ॥७२॥
यत्रैकेनैव बाणेन मया बाल्यादिका हताः । यत्रैकैव हि सीताया मम शय्या न चापरा । ७३॥
यत्राप्रतिहताज्ञा मे त्रैलोक्ये हि मुनीश्वराः । यत्र यानं पुष्पकं तु यत्र दूतोऽञ्जनीसुतः ॥७४॥
सुग्रीवराक्षसेन्द्रां च यत्र मित्रे ममांतिके । कोदण्डमदृशं चापं यत्र मेडारिनिषूदनम् ॥७५॥
सूर्यवंशे यत्र जन्म ततो दशरथो वरः । कौसल्या यत्र जननी यत्राहं स्ववशः सदा ॥७६॥
नहीं मिलेगा । अन्तमें ब्राह्मणके शापसे मेरे उस अवतारकी समाप्ति होगी । ५८ । इसके अनन्तर कलिमें दैत्यों को यज्ञकर्म करते देखकर मैं अतिशय मनोमोहक बौद्ध अवतार लूँगा ॥ ५९ ॥ अपनी बातोंस उन दुष्टोंकी मति यज्ञकी ओरसे फेरकर कुछ दिनों तक मैं संसारमें रहूँगा ॥ ६० । उस समय मैं मौनव्रत धारण करके मैले-कुचैले कपड़े पहने ओर कितने ही जू आदि जीवोंको शरीरमें पाले हुए सारे संसारके लोगोंको उपदेश दूँगा । सबकी अहिंसाव्रतका अभिनय दिलाऊँगा । उस जन्ममें दाढ़ीमें पड़े हुए जूँएं, कपड़ोंके फोलर तथा खटमल आदिके महान् दुःख उठाना पड़ेगा ॥६१॥ ६२॥ फिर कलियुगके अन्तमें सब लोगोंको वर्णसंकर होत देखकर मैं कल्कि अवतार लूँगा ॥ ६३ ॥ उस जन्ममें एक विप्रके यहाँ उत्पन्न हो ओर घोड़ेपर सवार होकर क्षणमात्रमें दुष्टोंका संहार कर डालूँगा ॥ ६४ ॥ हे ब्राह्मणों ! वह अवतार भी चिरस्थायी नहीं होगा । अतएव उसमें भी मे कुछ सुख नहीं भोग सकूँगा ॥ ६५ ॥ उसके बाद फिर सत्ययुग आ जायगा ओर मैं पहलेकी तरह फिर अवतार लेता रहूँगा ॥ ६६ ॥ इस तरह नौ अवतारोंमें कुछ सुख नहीं मिलेगा । किन्तु इस अवतारमें मैने अपने इच्छानुसार सुख भोग लिया है ॥ ६७ ॥ इस अवतारके समान कोई अवतार अवनीतलम न हुआ है, न होगा ॥ ६८ ॥ जिसमे सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, सीता जैसी स्त्री, कुश-लव जैसे महारथ र और धनुर्धारी पुत्र, तीनों लोकोंको जीतनेवाले भ्राता और कामधेनु आदि सात रत्न विद्यमान हैं । ६९ । ७० ।। जहाँ वेदके साक्षात् स्वरूप वसिष्ठ जैसे गुरु हैं आर्यावर्त जैसे पवित्र देशमें निवासस्थान है, राज्यभोगादि करनेवाला और कोई नहीं है, जहाँ सत्यका व्रत है, जहाँ अटल एकपत्नीव्रत है ॥ ७१ । ७२ । जहाँ केवल एक वाणसे शत्रुको मारनेकी सामर्थ्य है, जहाँ सीताकी और हमारी एक शय्या है ॥ ७३ ॥ जहाँ मुनिगण बेरोक-टोक जहाँ चाहें वहाँ आ जा सकते हैं जहाँ कि पुष्पकविमान जैसा सवारी है ॥ ७४ ॥ सुग्रीव और विभीषण जैसे मित्र हैं, शत्रुओंका नाश करनेवाला कोदण्ड जैसा धनुष है ॥ ७५ सूर्यवंशमें जन्म हुआ है, दशरथ जैसे पिता और कौसल्या जैसी