श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६२४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २० |
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सुख दुःखं समं ज्ञेयं सुखं हर्षो न मानयेत् ।
शोकः कार्यो विपत्तौ न चेति लोकान् प्रदर्शितम् ॥९४॥
राज्यभोग्यं मया त्यक्त्वा भुक्ताः क्लेशास्सदा वने।
कामक्रोधां रिपूणां च दुष्टानां हि वशो भुवि ॥९५॥
जनैः कार्यं सदा चेति ह्युपदेशं मया वने।
बहवो निहतास्तत्र राक्षसा मुनिहिंसकाः ॥९६॥
स्त्रीसङ्गः सर्वदा त्याज्यस्त्वेकाकी च तपेश्चरेत्।
नाभक्त निस्रुतिश्च हि स्त्रीषु कार्यं नरैः सदा ॥९७॥
इत्थं मयोपदिशता सीतयाऽथ तदा वने ।
वियोगो दर्शितो लोकान् मत्तो भिन्ना न जानकी ॥९८॥
कदापि जायते विप्राः सत्यं चेदं ब्रवीम्यहम् ।
आर्त्तस्य रक्षणं कार्यं कार्यो दुष्टस्य निग्रहः ॥९९॥
मयोपदिशता चेत्थं जनान्सूर्य्यसुतस्तथा।
दृप्तौ निहतौ वालिरावणावितरे हताः ॥१००॥
कीर्तिः कार्या जनेष्वत्र मयोपदिशता त्विति ।
पारमपारात्सिन्धोस्तीरे किंमात्राद्यगतेने मे ॥१०१॥
यद्यपि शुद्धं स्वे चित्ते विरुद्धं च जनेषु यत् ।
त्यक्तव्यं तत्प्रियं चापि मयोपदिशता त्विति ॥१०२॥
जनापवादात्तु सुन्द्धाऽपि लक्ष्यापि दिव्यदर्शनात् ।
लोकापवादभीत्या सा पुरा त्यक्ताऽत्र जानकी ॥१०३॥
स्वयमेवात्र यत्त्यक्तं शुद्धं ज्ञात्वा हि तत्पुनः ।
अङ्गीकार्यं जनैर्बुद्ध्या मयोपदिशता त्विति ॥१०४॥
जनापवावृता सीता पुनः स्वीकृता मया शुभा ।
एकपत्नीव्रतादानं राजकर्त्तान्यनेकधाः ॥१०५॥
अश्वमेधादियज्ञश्च सदाचारो जगद्गुरः ।
स्नानमध्याधिकं यच्चन्मयाऽत्र क्रियते सदा ॥१०६॥
तन्मवै जनशिक्षार्थं मुक्तसङ्गस्य किं मम ।
कर्मणांनन्वयं मोक्षविद्याः सदानन्दस्वरूपिणः ॥१०७॥
अहं सदानन्दमयः सुखात्मा सुखदो नृणाम्।
अवतारस्त्ववेन सुखं दुःखं मयाऽकारि ॥१०८॥
यदत्र भवतामग्रे कौतुकार्यं न संशयः ।
उत्तरोत्तरोत्तमाश्वंमवताराः स्मृतं मया ॥१०९॥
पुत्र अधिक होनेसे अधिक त्यागना न जाना चाहिए। यह स्वदेश देश हुए मैंने भरतका परित्याग कर दिया था ॥९३॥ सुख दुःख शोक समान समझना चाहिए। सुखमें न विषय हर्षित हो, न दुःखमें घबराय। यह उपदेश जनके लिए ही मैंने जानकीको छोड़कर मयूर दम्पती संप्रतीको अपनाया था। काम-क्रोध आदि दुष्ट शत्रुओंको मारना चाहिए ॥९४॥९५॥ यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने वनमें रहकर बहुतसे मुनिहिंसक राक्षसों को मारा था। ९६। विषयमें अधिक आसक्त होना ठीक नहीं बल्कि उनका सङ्ग त्यागकर दूर रहना हुआ तपस्या करे। ९७। यह उपदेश देनेके लिए मैंने वनमें सीताको तजकर उनसे वियोग दर्शाया था। वास्तवमें सीता हमसे पृथक् कदापि नहीं हो सकतीं। ९८॥ हे ब्राह्मणो ! यह सब बात मैंने सर्वथा सत्य कहा है। मनुष्यमात्रको चाहिए कि जो दुःखी, जनका रक्षा करे और दुष्टोंको दण्ड दे ॥९९॥ सुग्रीव और विभीषणकी रक्षा करके दुष्ट बाली और रावणको मारकर संसारको मैंने यही उपदेश दिया है ॥१००॥ इस संसारमें मनुष्यको चाहिए कि वह अपना सुयशका विस्तार करे। इसलिए मैंने समुद्रके पारसे पत्थर मँगाये थे। वैसे तो क्या पाषाणको जलकर लङ्का नहीं पहुंच सकता था? ॥१०१॥ यदि कोई वस्तु अपनेको प्रिय हो किन्तु दुनियॉकी दृष्टिमें विरुद्ध हो तो उस प्रिय वस्तुका भी परित्याग कर देना चाहिए। यह नियम देनेके लिए ही मैंने सुलोभा आत्मसाक्षात् द्रष्टा तथा पवित्र जानकर भी लोक अपवादके भयवश सीताका परित्याग कर दिया था ॥१०२।१०३॥ अथवा यदि किसी पवित्र वस्तुका त्याग दे और बादमें ज्ञात हो कि वह शुद्ध है तो उसको फिरसे अङ्गीकार कर लेना चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने पूर्वमें त्याग हुई सीताको फिर स्वीकार कर लिया। उसी प्रकार एकपत्नीव्रत, अनेक तरहके राजकार्य अश्वमेध यज्ञ, सदाचार, जप, तप, स्नान, संध्या आदि जितना भी काम हम करते हैं, सो सब लोगोंकी उपदेश देनेके लिए ही कर रहे हैं ॥१०४-१०६॥ वैसे तो हमारी मायाजालसे अलग सदा आनन्दस्वरूप, कर्मसे परे, सदा आनन्दमय, सुखात्मा और समस्त मनुष्योंके सुखदाता मुझ रामके लिए इन सब कृत्योंसे क्या मतलब ? ये सुख दुःख जो बताये, वे भवतारक आधारपर आप लोगोंके कौतुकके लिए कहे हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। अपने भक्तके सन्तोषार्थ विशेष-गुणसम्पन्न ये अवतार गिनाये, वास्तवमें मेरे लिए सब अवतार बराबर हैं। किन्तु अपनी बुद्धिसे भली भाँति