भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२५

विशेषगुणवानुक्तः सन्ति सर्वे समा मम। सम्यग्युद्ध्या विचार्यात्र चरित्रैः सकलैश्वयम् ॥ १०९॥ द्वावतारौ जलचरौ तथा वनचरौ च द्वौ। द्वौ तौ च वल्कलाधारी एको वैश्यश्च गोपकः ॥ ११० । एकस्तु मलिनश्चापि परश्च क्षणिकस्तथा। एवं भूता मन्त्रिपाश्चावतारास्तोषदा न मे ॥ १११। अयं सर्वविशिष्टोऽत्र ह्युपासकजनप्रियः अवतारस्त्वहं वेद्मि सेवनान्मङ्गलप्रदः ॥११३॥ चरित्राण्यतिरम्याणि पातकान्तानि वै मया। कुर्वन्त्यस्मिन्नवतारे श्रवणान्मुक्तिदानि हि ॥११४। सदा जना भजन्त्यत्र ह्यवतारममूं मम। भक्ता येऽस्यावतारस्य ते मेऽतीव प्रियाः सदा ॥ ११५ एवं सर्वमिदं विप्रा आनन्देन मयोदितम्। दोषमारोपयन्त्यस्मिन्नवतारेऽथ ये जनाः ॥११६॥ ते मद्भवेष्या नरकेषु पतंति सह पूर्वजैः। श्रीरामदास उवाच एवमुक्त्वा रामचन्द्रः सम्पूज्य हि मुनीश्वरान् ॥११७। विसृज्य सकलान्सीतां रंजयामास राघवः। एवं शिष्य मया प्रोक्तमवतारप्रवर्णनम् ॥११८ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे उत्तरार्धे अवतारवर्णनं नाम विंशः सर्गः ॥ २० ।


एकविंशः सर्गः

( रामका अपने दासको वरदान देते हुए दो रूप धारण करना )

श्रीरामदास उवाच

एकदा जानकीं द्रष्टुं सप्तद्वीपांतरस्त्रियः। मुनीनां पार्थिवानां च सुहृदां व्यवसायिनाम् ॥ १ ॥ सामान्यक्षत्रियाणां च वैश्यानां च सहस्रशः। चैत्रस्नानमिषेणैव ह्युद्यद्वाहनसंस्थिताः ॥ २ ॥ दृष्ट्वा समागतास्ताश्च जानकी गजगामिनी। प्रत्युद्गम्यानयामास स्वान्तागारमतिसादरात् ॥ ३ ॥

विचार करके मैं इस निश्चयपर पहुंचा हूं कि समस्त अवतारोंमें यह रामावतार सर्वश्रेष्ठ है । १०७-११० ॥ दो अवतार जलचर हुएके, दो वनचर, दो वल्कलधारी, एक वैश्यवर्णका गायहरू, एक मलिनवंश-वाला और एक क्षणिक ये भूत तथा भविष्यके सारे अवत र मर मनक नहा हैं—इनम मैं प्रसन्न नहीं हूँ ॥१११॥ ॥ ११२ ॥ मै जहांनक जानता हूं, समस्त अवतार म उपासक जनांका प्रिय तथ सेननम मङ्गलप्रद यहा रामावतार है ॥ ११३ ॥ इस अवतारम मॅन जितने कम किय हे व सब अतिशय रम्य, पातकोंका नष्ट करनवाल तथा सुननेस मुक्ति देनवाले हैं ॥ ११४ ॥ अताहा चाहिये कि मर इसा अवत रका भजन कर जो लोग इसकी उपासना करते हैं, वे मुझे सदासे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ ११५ ॥ हे विप्रो ! यह सब रहस्य मँन आनन्दक साथ आप लोगोंको सुनाया। जो लोग मेरे इस अवतारम भी दोषारोप करत है, व मेर शत्रु हन्कर अपन पूवर्जाक साथ नरकमें गिरत हैं ॥ ११६ ॥ श्रीरामदास कहत है—इस प्रक रका बात करक रामन उन मुनिपांका पूजन किया और सबको विदाई दी । ११७ ॥ तत्पश्चात् साताको प्रसन्न करनवाली बात करन लग । ह शिष्य ! मैने इस तरह तुम्हारे समक्ष सभी अवतारोंका वणन किया । ११८ । इति श्रीमदानन्दरामायण वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्ड उत्तरार्द्धे अवतारवर्णन नाम विंशः सर्गः । २० ॥

श्रीरामदास कहन लगे-एक बार सीताको देखनके लिये साता द्वीपांका स्त्रियां जिनम मुनियांकी, राजाओं-की, मित्रोंकी, व्यवसायियोंकी ॥ १ ॥ साधारण श्रणके क्षत्रियोंकी तथा वैश्योंका हजारोका संख्यामे नारियां चैत्रस्नानके व्याजसे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर अयोध्यामे आयीं ॥ २ ॥ उन्हें आती देखकर गजके समान मन्दगतिसे चलनेवाली सीता शीघ्र उनके आगे पहुंचीं और आदरके साथ अपनी रंगशालामें ले गयीं ॥३॥