श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५३० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २१ |
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तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगुः सुस्वरं नटाः । एवं प्रशंस्यो रामस्तदा नामोद्ग्राह्याणि सः ॥ ६८ ॥
तां रात्रिं समतिक्रम्य प्रभाते रविनन्दनः । स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा गजारूढोऽभवत्पुनः ॥ ६९ ॥
क्रोशद्वयं गतो गत्वाऽग्रे द्वौ मार्गौ निरीक्ष्य च । चक्रे वै द्वे निजे देहे चकार रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
सदा द्वयोर्मार्गयोश्च गच्छन्तौ सीतया सह । पुत्राद्यैर्बन्धुभिर्युक्तौ द्वौ रामौ सकला जनाः ॥ ७१ ॥
ददृशुः पुष्पकं द्वे च द्वौ जातौ ब्रह्मचारिणौ । मन्त्री विप्रश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७२ ॥
विश्वामित्राश्रमं चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । वाल्मीकेश्चाश्रितश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७३ ॥
वाल्मीकेश्छात्र चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । एवं तौ राघवौ तत्र सर्वद्रव्यैर्युतावुभौ ॥ ७४ ॥
द्विजान्वि ददृशुस्तत्र गच्छन्तौ राघवावुभौ । तयोर्मार्गे हि तयोर्मुन्न्योस्तदाश्रमे ॥ ७५ ॥
ससैन्यौ सीतया युक्तौ बन्धुपुत्रवधूर्जनैः । सम्पूज्य मुनिभिर्हृष्टैः प्रत्युत्थानादिपूजितौ ॥ ७६ ॥
तयोर्यागं विधायाथ परितुष्टौ पुनः पुनः । समाजग्मुः श्रीरामौ ससैन्यौ पूर्ववन्मुदा ॥ ७७ ॥
यत्र द्वे निजदेहे वै कृते तत्र रघूत्तमो । समागत्य पुनश्चैकं निजदेहं चकार सः ॥ ७८ ॥
वाल्मीकीयो ब्रह्मचारी विश्वामित्राङ्घ्रिसम्भवः । भिन्नदेहे स्वैकरूपं भजतस्स्म तदा द्विजौ ॥ ७९ ॥
ससैन्यं पुष्पकं चापि बभूवैकं तु पूर्ववत् । ततः श्रीरामचन्द्रश्च विवेश नगरीं निजाम् ॥ ८० ॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि ननृतुर्वारयोषितः । पौरनार्यो विमानस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ८१ ॥
तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगन्तं भटादयः । एवं नानाकौतुकानि पश्यन्मार्गे शनैः शनैः ॥ ८२ ॥
ययौ निजगृहं रामः सभायां संविवेश ह । सीताऽपि निजगेहं मा प्रविवेशोर्मिलादिभिः ॥ ८३ ॥
एवं भूरूप रामेण कौतुकानि महान्ति च । अमानुषाणि यान्यत्र कृतानि च सहस्रशः ॥ ८४ ॥
वाल्मीकिना विस्तरेण वर्णितानि हि कृत्स्नशः । सारं सारं मया तेभ्यः संगृह्याद्य कथानकम् ॥ ८५ ॥
वेश्यायें नाचने लगीं ॥ ६५-६७ ॥ बन्दीजन रामकी विरुदावली सुनने तथा नटगण मीठे-मीठे स्वरोंमें गाने लगे । इस प्रकार अपने रामभवनमें प्रस्थान करके राम रास्तेमें बने हुए डेरेपर पहुंचे ॥ ६८ ॥ वह रात्रि रामने वहीं बितायी । सवेरे उठे तो स्नानादि नित्यक्रिया को और फिर हाथीपर बैठकर चल दिये ॥ ६९ ॥ दो कोस आगे जानकर जहांसे विश्वामित्र तथा बाल्मीकिके आश्रमके रास्ते अलग होते थे, वहांसे उन्होंने सेना समेत आत्मा दो स्वरूप बना लिया ॥ ७० ॥ उस समय दोनों रास्तेमें राम सेना, सीता तथा पुत्रवधू आदिये युक्त होकर चले। उस समय जितने भी मनुष्य गाय थे, वे सब रामने दो दिखायी दिये ॥ ७१ । पुष्पक विमान भी दो हो गया और दोनों ब्रह्मचारियोंमेंसे एक रामको विश्वामित्रके आश्रमकी ओर ले चला, दूसरा बाल्मीकिके आश्रमको ॥ ७२ । ७३ । उस समय मनुष्यसे लेकर सांपके कुले तक दो-दो होकर दिखाई दे रहे थे। वे लोग उन दो शरीरोंको सब देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ७४ ॥ इस प्रकार वे दोनों राम अपनी-अपनी सेना, सीता और बन्धुओंके साथ दोनों आश्रमोंको चले । जब कि आश्रमपर पहुंचे तो दोनों ऋषियोंने अगवानी करके उनकी पूजा की ॥ ७५ ॥ इस प्रकार पहुंच-पहुंचकर उन दोनोंका यज्ञ समाप्त हो जानेपर फिर वे दोनो राम पहलेकी तरह अयोध्याको लौटे । ७६ ॥ ७७ ॥ जाते समय जिस स्थानपर रामने अपना दो रूप बनाया था, वहां पहुंचकर फिर एक हो गये । विश्वामित्रका ब्रह्मचारी तथा बाल्मीकिका ब्राह्मण ये दोनों भी एक ही एक हो गये । ७८ । ७९ । उसी तरह पुष्पकविमान और सेना भी एक हो गयी। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी आनन्दपूर्वक अपनी अयोध्या नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८० ॥ उस समय भी नाना प्रकारके बाजे बजे और वेश्यायें नाचीं । पुरवासियोंने नारियल द्वारा विमानसे रातभर फूलोंकी वर्षा की, बन्दीजनोंने स्तुति की और गानेवालोंने अच्छे-अच्छे राग गाये । इस प्रकार रास्तेमें तरह-तरहके कौतुक देखते हुए धीरे-धीरे ॥ ८१ ॥ ८२ । वे अपने भवनमें गये और प्रणाम परचकर राजसिंहासनपर बैठे । सीता उर्मिला आदिके साथ महलके भीतर गयीं ॥ ८३ ॥ हे शौनक ! रामने संसारमें एकान्तके जिन महान् और अलौकिक कामोंको किया था, उनको बाल्मीकिने विस्तृत वर्णन किया है और मैंने तो उसमेंसे सारभागमात्र लेकर सब कथा सुनायी