श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 547, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१
तवाग्रे कथ्यते शिष्य सङ्क्षेपेणाद्यया प्रभोः । न शक्तोऽहं यदर्थं च रामेणाज्ञापितस्त्वरम् ॥८६॥ वक्तुं स्वचरितं पुण्यं रम्यमानन्ददायकम् । वाल्मीकिश्चरितं रम्यं आवयोः संवादमात्रयोः ॥८७॥ यः पूर्वं विरचितवान् स्वीयकालेऽत्र भूतवत् । यथा रामस्य चरितं पूर्वं रामावतारतः ॥८८॥ एवं संवर्णितं कृत्स्नं गोप्यं यच्च कृतं रहः । न वाल्मीकिप्रभः कश्चित्केवलो भविष्यति ॥८९॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डेऽत्तराधे रामोत्तरज्ञानं तथा रामादीनां वंद्यकरणं नामैकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः
(सीता द्वारा टूटा तुलसीपत्र पुनः डालमें जोड़ना)
श्रीरामदास उवाच
इदानीं रामचन्द्रस्य लीलाकौतूहलावहाम् । अन्यद्रम्यं कथ्यते हि मया तच्छृणु सादरम् ॥ १ ॥ एकदा राघवस्तस्थौ सभाशालायां चोपरि । बन्धुभिर्मन्त्रिभिश्चैव पौरैर्जानपदैः सह ॥ २ ॥ पुत्राभ्यां च सुहृद्भिश्च मित्रैर्मन्त्रिजनेः सह । एतस्मिन्नन्तरे भूरिकीर्त्तिना सुहृदा चरैः ॥ ३ ॥ द्राक्षाफलादिभिः पूर्णास्तथा पुष्पैः सुतूलिताः । करण्डिकाः प्रेषिताश्च रम्यार्थे मन्त्रतः ॥ ४ ॥ ताः सर्वा राघवो दृष्ट्वा प्रेषयामास चान्तिके । युक्ता यामविना सीता क्रीडाभवनसंस्थिता मुदा ॥ ५ ॥ दृष्ट्वा करण्डिकाः सन्ति चेत्यभूत्कुतूहला । ततो रामोपलभ्यन्तं दृष्ट्वा पद्मं हि जानकी ॥ ६ ॥ करेणादाय पद्मं च राघवायानर्पणं विना । सा तन्मुगन्ध्यं जिघ्रन्ती वारं वारं मुदान्विता ॥ ७ ॥ काण्डिकां पूर्ववच्च समाच्छाद्य विहस्तया । स्थापयामास गेहेऽथ मोचयित्वा करण्डकाः ॥ ८ ॥ तद्वृत्तं रामचन्द्रोऽथ ज्ञात्वा सभास्थितः । विममर्श विचारं च मनसा मुदान्वितः ॥ ९ ॥ नातश्चेदं कृतं कर्म योग्यं शुचे स्मृतं न हि । घ्राणार्थं मे निवेद्यान्ते कृतं कार्य्यार्थं तथा ॥१०॥
हैं ॥८४॥८५॥ क्योंकि प्रभुन मुझे आज्ञा दी थी कि शीघ्र जा कर कहो। इसलिए भगवान्ने स्वयं मुख कथा सुननेकी आज्ञा की थी। और वाल्मीकिजीका ही जो चरित्र है सिर्फ हम दोनोंके परस्पर सुनानेके लिए भूतकालकी तरह भविष्यका सारा वृत्त पूर्व रामके जन्मसे ही लिख दिया था॥८६-८८॥ वह वर्णन भी इतना अच्छा किया कि रामने जो गुप्त में किया था, वह भी सब लिख दिया। वाल्मीकिके समान न कोई कवि हुआ है न होगा। इस प्रकार आनन्दरामायणान्तर्गत राज्यकाण्डोत्तर-रामोत्तरज्ञान वन्दिकरण नामक इक्कीसवां सर्ग समाप्त हुआ॥२१॥
श्रीरामदासने कहा- अब मैं तुम्हें रामकथा एक दूसरा आनन्द और कौतुकका सुनाता हूँ। उसे आदरपूर्वक सुनो ॥१॥ एक समय रामचन्द्रजी सिंहासनपर बैठे हुए थे। उस समय उनके समस्त भ्राता, मन्त्री, पुरवासी, दोनों पुत्र सम्बन्धी तथा मित्र आदि भी उपस्थित थे। उस समय उनके सुहृद् राजा भूरिकीर्तिने दूतों द्वारा अंगूर आदि विविध प्रकारके फलोंसे भरी हुई बहुमूल्य पेटियां भेजीं ॥२-४॥ उनको देखकर रामने उसे भीतर सीताके पास भेजवा दिया। उस समय सीता अपने सखियोंके साथ क्रीडाभवनमें थीं ॥५॥ उन पिटारियोंको देखा तो बड़ी उत्सुकताके साथ खोल-खोलकर कुछ पिटारियाँ देखीं, किन्तु उनके भीतर कमलका फूल भरा दीख पड़ा ॥ ६॥ तब प्रसन्न मनसे उसने उनमें से एक कमलका फूल निकाला और रामको अर्पण किये बिना ही सूंघ लिया ॥७॥ तदनन्तर पिटारियोंको पहलेकी तरह ठीक करके घरमें रखवा दिया ॥ ८॥ सभा में बैठे-बैठे ही रामको यह बात मालूम हो गयी। उन्होंने बार-बार इसपर विचार किया ॥९॥ तब उन्होंने सोचा कि सीताने यह ठीक नहीं किया, जो मेरे सूंघे बिना ही कमल सूंघ