श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
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Read in context५५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १
यः पिबन्सततं रामचरितामृतसागरम् । अतृप्तस्तं मुनिं वन्दे प्राचेतसमकल्मषम् ॥ ९ ॥ गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् । रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥१०॥ अञ्जनीनंदनं वीरं जानकीशोकनाशनम् । कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ॥११॥ उल्लंघ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः । आदाय तेनैव ददाह लंकां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥१२॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं मनसा स्मरामि ॥१३॥ रामाय भद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥१४॥ जितं भगवता तेन हरिणा लोकधारिणा । अनेन विश्वरूपेण निर्गुणेन गुणात्मना ॥१५॥ इति मंगलाचरणम्
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् । नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम् ॥ १ । को न्वस्मिन्सांप्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः । २ ॥ चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः । विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकः प्रियदर्शनः ॥ ३ ॥ आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः । कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥ ४ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे । महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् । ५ ॥ श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः । श्रूयतामित्यामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः । मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥ ७ ॥
प्राप्त होता हो ? कोई नहीं ॥८॥, जो निरन्तर रामचरितरूपी अमृतरूपसागरका पान करते हुए भी कभी नहीं तृप्त होने वाले, ऐसे कल्मषरहित श्रीवाल्मीकि मुनिको मैं प्रणाम करता हूँ । विशाल समुद्रको जिन्होंने गोके खुर डूबने योग्य बनाया, राक्षसको मच्छर समझा और जो इस रामायणरूपिणी महामालाके रत्न हैं, उन हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ । १० ॥ अञ्जनाके सूनून्, जानकीके शोकनाशक, वानरोंके प्रभु, अक्षयकुमारके संहारकारी तथा लंकाके लिए भयावने वीर मारुतिकी मैं वन्दना करता हूँ ॥११॥ जो हंस खेलमें समुद्रकी जलराशिको लांघकर लङ्का पहुंचे, वहीं सीताके शोकरूपी अग्निको लेकर उन्होंने उसान से ही लंकाका भस्म कर दिया, उन अञ्जनीनन्दनको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ जिनमे मनके समान वेग है, वायुके सदृश त्वरा है, जिन्होंने इन्द्रियां जीत ली है, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ऐसे वायुके पुत्र, वानरसंघके मुखिया और श्रीरामके दूत हनुमान्को मैं मनमें स्मरण करता हूँ । १३ ॥ राम, रामभद्र, रामचन्द्र, विधातास्वरूप, रघुवंशके नाथ, जगन्नाथ और सीतापति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥ भगवान्, संसारके पालक, अज, और विश्वरूप उन रामने निर्गुण होकर भी सगुणरूपसे सारे संसारको अपने वशमें कर लिया है ॥ १५ ॥ इति मङ्गलाचरणम् ।
विद्वानोंमें श्रेष्ठ, तपस्या और स्वाध्यायमे संलग्न मुनिश्रेष्ठ नारदसे तपस्वी वाल्मीकिने पूछा— ॥ १ ॥ इस संसारमें इस समय गुणवान्, वशपराक्रमशाली, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता और अपने व्रतपर दृढ़ कौन है ? ॥ २ ॥ कौन ऐसा है, जो सच्चरित्रयुक्त है ? कौन सब प्राणियोंके हितमें लगा हुआ है और कौन ऐसा है जो विद्वान् समर्थ तथा देखनेमें सुन्दर है ॥ ३ ॥ कौनमा ऐसा पुरुष है जो आत्मज्ञानी, क्रोधको वशमें किये हुए तथा तेजस्वी है और दूसरेसे ईर्ष्या नहीं करता ? संग्रामभूमिमें जिसके कुपित होनेपर देवता भी भयभीत होजाते, ऐसा कौन है ? ॥ ४ ॥ यह मैं सुनना चाहता हूँ। उसे जाननेके लिए मुझे बड़ा कौतूहल है । हे महर्षि ! आप उक्त प्रकारके पुरुषको जान सकते हैं ॥ ५ ॥ त्रिलोकीके ज्ञाता नारद वाल्मीकिकी बात सुनकर बोले—अच्छा, सुनो । इस तरह संबोधव करके महर्षि नारद कहने लगे—॥ ६ ॥ हे मुने ! आपने जिन गुणोंका वर्णन किया है, वे बहुत ही दुर्लभ हैं । फिर भी मैं अच्छी तरह विचार करके