श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५५५
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी ॥ ८ ॥
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ ९ ॥
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥ १०॥
समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् । पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ॥११॥
धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः । यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१२॥
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः । रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥१३॥
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता । वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः । १४॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् । सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । १५॥
सर्वदाऽभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः । आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥१६॥
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः । समुद्र इव गांभीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥१७॥
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः । कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः । तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथः सुतम् । प्रकृतीनां हिते युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपतिः । तस्याभिषेकसंभारं दृष्ट्वा भार्या च कैकयी ॥२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनंमयाचत । विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥२२॥
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः । विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् । २३॥
उन गुणान् युक्त मनुष्यको बतलाना हूँ। ७॥ जिसके विषयमे आप सब कुछ कहना चाहता है उन्हे लोग राम कहते हैं । वे आत्मज्ञानी, महाबली, तेजस्वी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं ॥८॥ वे बुद्धिमानी, नीतिज्ञ, वक्ता, श्रीमान् और शत्रुओंके विनाशक हैं उनका खूब लम्बा-चौडा कन्धा है। लम्बी-लम्बी भुजायें हैं। शंखकी तरह उनकी ग्रीवा है और विशाल डाढ़े हैं ॥९॥ उनकी विशाल छाती है। वे हाथमें विशाल धनुष धारण किये रहते हैं उनकी पसलियां छिप रहती हैं। वे शत्रुओंका दमन करनेकी प्रबल शक्ति रखते हैं जानु (घुटनों) तक पहुंचनेवाले उनके हाथ हैं, सुन्दर माथा है, बलिष्ठ ललाट है, सराहनीय पराक्रम है, बराबर और सुडौल उनके अंग हैं, मनोहारीरंग है और उनका प्रताप भा साधारण नहीं है। उनकी सुदृढ छाती है, बडी-बडी आँखें हैं वे शोभासम्पन्न हैं और उनमें सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं ॥१०।११॥ वे धर्मज्ञ और सत्यसन्ध (अपनी प्रतिज्ञाको निभानेवाले) हैं। वे सदा प्रजाके हितमें रत रहते हैं। वे यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, पवित्र, वशी और समाधिमान् हैं ॥ १२॥ वे राम प्रजापतिके समान श्रीमान्, जगत्के पालक एवं शत्रुओंके विनाशक हैं। वे समस्त संसारकी तथा धर्मकी सर्वथा रक्षा करते हैं । १३ वे धर्मके रक्षक हैं और निज जनकी रक्षा करते हैं। वे वेद-वेदाङ्गोंके सारे तत्त्वोंको जानते हैं और धनुर्वेदमे एक असाधारण प्रतिभा रखते हैं ॥ १४। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ तथा तत्त्वको जाननेवाले, स्मृतिमान् प्रतिभाशाली, सबको प्रिय, साधु, उदानात्मा और पण्डित हैं ॥ १५ ॥ जैसे समुद्र नदियोंसे मिलता है वैसे ही वे सदा सज्जनोंसे मिलते हैं और उनका दर्शन सबको सुखदायी होता है ॥ १६। वे राम सर्वगुणसंपन्न, कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, समुद्रके तुल्य गम्भीर तथा हिमालयके समान धैर्यशाली हैं ॥ १७॥ वे वीर्य एव बलमें विष्णुके सदृश हैं, चन्द्रमाके सदृश सबको उनका दर्शन प्रिय है वे क्रोधमें कालानिके समान और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं ॥ १८॥ त्यागमे कुबेरके सदृश, सत्यमें दूसरे धर्मराजके समान तथा सब गुणोंसे युक्त हैं। सब पुत्रोंमे बड़े प्रजाके हितमें संलग्न एवं प्रजाप्रिय उन सत्यपराक्रम रामको राजा दशरथने प्रजाके हितके लिए युवराज बनानेका निश्चय किया । श्रीरामके अभिषेककी तैयारी देखकर पूर्वकालमें वरप्राप्त दशरथकी प्यारी रानी कैकेयीने उसी समय अपने पतिसे रामके निर्वासन तथा भरतके राज्याभिषेकका वर माँगा ॥ १६।२०।२१।२२॥ तदनुसार