भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५६६ । आनन्दरामायणे । [ सर्गः १

स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् । पितुर्वचननिर्देशात्कैकेय्याः प्रियकाम्यया ॥ २४॥

तं व्रजंतं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह । स्नेहाद्विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ २५॥

भ्रातरं दयितो भ्रातुः सौभ्रात्रमनुदर्शयन् । रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥ २६॥

जनकस्य कुले जाता देवमायायेव निर्मिता । सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥ २७॥

सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा । पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥ २८॥

शृङ्गवेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् । गुहनामानं च धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥ २९॥

गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया । ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ ३०॥

चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् । रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वन त्रयः ॥ ३१॥

देवगन्धर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन्सुखम् । चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा ॥ ३२॥

राजा दशरथः स्वर्गं जगाम विलपन्सुतम् । गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥ ३३॥

नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबलः । स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥ ३४॥

गत्वा तु सुमहात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । अयाचद्भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः ॥ ३५॥

त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् । रामोऽपि परमोदारः सुमुखः सुमहायशाः ॥ ३६॥

न चैच्छात्पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबलः । पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः ॥ ३७॥

निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः । स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥ ३८॥

नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं रामागमनकांक्षया । गते तु भरते श्रीमान्सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ ३९॥

रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च । तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ॥ ४०॥


सत्यवचनरूपी दृढ बन्धनमें बंधे हुए राजा दशरथने अपने प्रिय पुत्र रामको निर्वासित कर दिया ॥ २३ ॥ वीर राम माता कैकेयीकी भलाई और पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके निमित्त उनकी आज्ञा मानकर वनको चल दिये ॥ २४ ॥ सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले स्नेह और विनयसम्पन्न प्रिय भ्राता लक्ष्मणने भाईको वन जाता देखा तो उन्होंने भी स्नेहवश उनका साथ दिया ॥ २५ ॥ सुमित्रानन्दन लक्ष्मण भली भाँति भ्रातृत्व निभाते थे और रामकी भार्या सीता सदैव रामको प्राणके समान प्रिय समझने हुई उनके हितमें संलग्न रहती थीं । वह जनकके कुलमें उत्पन्न देवमायासे निर्मित, सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त एवं सब नारियोंमें एक उत्तम नारी थीं ॥ २६-२७ ॥ जिस तरह रोहिणी चन्द्रमाका अनुगमन करती है सीताने भी रामका उसी प्रकार अनुगमन किया । उस समय पुरवासी तथा पिता दशरथ भी बड़ी दूरतक रामके साथ गये ॥ २८ ॥ गङ्गाके किनार शृङ्गवेरपुरमें पहुंचकर रामने सारथी (सुमन्त्र) को विदा किया और निषादोंके राजा धर्मात्मा एवं प्रिय मित्र निषादराजसे भेंट की । २९ ॥ निषाद, लक्ष्मण और सीताके साथ-साथ राम एक वनके बाद दूसरे वन तथा बड़ी-बड़ी नदियोंको पार करके भरद्वाजकी आज्ञासे चित्रकूट वनमें एक सुन्दर आश्रम बनाकर रहने लगे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ देवताओं तथा गन्धर्वो आदिके समान वे तीनों वहाँ आनन्द रह रहे थे । रामके वन जाने ही पुत्रवियोगमें शोकातुर राजा दशरथ पुत्र रामके लिए विलाप करते हुए अपने प्राण त्याग दिये । उनके देहावसानके अनन्तर वसिष्ठादि मुख्य मुख्य ब्राह्मणोंने राज्य ग्रहण करनेके लिए भरतसे बहुत कहा, किन्तु वीर भरत राज्यके प्रति अनिच्छा प्रगट करके रामको मनानेके लिए वनको चल दिये ॥ ३२-३४ ॥ भरतने पराक्रमी रामचन्द्रजीसे प्रार्थना करते हुए कहा—हे धर्मज्ञ ! आप ही अयोध्याके राजा बनें । परमोदार सुमुख और कीर्तिशाली रामचन्द्रने पिताकी आज्ञाका पालन अपना धर्म समझकर राज्यसे अनिच्छा प्रकट की और भरतको समझाकर राज्यके लिये अपनी पादुका दी और लौटनेका बार-बार अनुरोध किया । ३५-३७ ॥ इस प्रकार रामने भरतको लौटाया और अपनी कामना सफल होते न देख भरत भी रामके चरणोंका स्पर्श करके अयोध्या लौट आये ॥ ३८ ॥ तदनन्तर रामके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए भरत नन्दिग्राममें रहकर करने लगे । भरतके वन जानेपर सत्यसंध, श्रीमान् एवं जितेन्द्रिय