भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 630

६१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५

मूल श्लोक (Sanskrit Shlokas)

शृङ्खला कृष्णवर्णा च पदैः पञ्चभिरुत्तमा । तस्याः पार्श्वद्वये कार्ये वल्ल्यौ हरितवर्णके ॥ १६४॥
पृथगेकादशपदैस्ततः पीते तु शृङ्खले । षड्भिः पदैरुभयतो भद्रं षोडशपादकम् ॥ १६५॥
आरक्तं च सिता वाप्यो दक्षाष्टादशपादजाः । कृष्णान्यष्टादशपदैरेव लिङ्गानि कारयेत् ॥ १६६॥
मस्तकोपरि भद्रस्य लोहिते शृङ्खले शुभे । द्वाभ्यां पदाभ्यां च पृथङ् मध्ये हरितशृङ्खला ॥ १६७॥
रचिता त्रिपदा रम्या वापीनां मस्तकोपरि । आरक्ते द्वे पदे कार्ये चैकं हरितशृङ्खला ॥ १६८॥
उभयोः पार्श्वयोर्लिङ्गमन्तर्कल्प्यं सिते पदे । एवं सर्वत्र वेत्तव्यं परिधिः पीतवर्णकः ॥ १६९॥
सप्ताशीतिपदैश्चैव समाप्ता प्रथमा ततिः । प्रोच्यतेऽथ द्वितीया तु पक्तिस्त्रिपञ्चपदजा ॥ १७०॥
शशी च शृङ्खलावल्ल्यौ शृङ्खले ज्ञेयं पूर्ववत् । भद्रं विंशतिपदैर्ज्ञेयं नव वाप्यश्च षोडशैः ॥ १७१॥
पदैरष्टाथ लिङ्गानि भद्रयोर्मस्तकोपरि । द्वाभ्यां कार्ये शृङ्खलेऽत्र लोहिते ह्युत्तरे तयोः ॥ १७२॥
द्विपदा शृङ्खला पीता हरिता त्रिपदा स्मृता । आरक्तं च पदं कार्यं वापीनां मस्तकोपरि ॥ १७३॥
पूर्ववत्सकलं ज्ञेयमेकषष्टिपदैः शुभाः । परिधिः पीतवर्णश्च ज्ञाता पक्तिर्द्वितीियका ॥ १७४॥
ऊनेकेन पदा षष्टिपदैः पक्तिस्तृतीियका । भद्रं षड्भिः पदैः प्रोक्तं सप्तलिङ्गानि कारयेत् ॥ १७५॥
दसु वाप्यः स्मृताः शेषं पूर्ववच्च प्रकीर्तितम् । सप्तचत्वारिंशत्पदैः परिधिश्च प्रकीर्तितः ॥ १७६॥
ज्ञाता तृतीया पक्तिरियं चतुर्थ्यर्थ निगद्यते । पञ्चचत्वारिंशत्पदैरियं पक्तिरुदाहृता ॥ १७७॥
भद्रमेकपदैर्ज्ञेयं पञ्च वाप्यस्तत्र कीर्तिताः । तुर्यलिङ्गानि कार्याणि भद्रस्य मस्तकोपरि ॥ १७८॥
आरक्ता षट्पदा वल्ली पीतपीतं त्रिभिः पदैः । ज्ञाता चतुर्थपक्तिर्हि पञ्चम्यैकोनत्रिंशद्भिः पदैः ॥ १७९॥
भद्रं नवपदं ज्ञेयं त्रिवाप्यो द्वौ हरी स्मृतौ । त्रिपदा शृङ्खला भद्रस्य मद्रस्यापरि कीर्तिता ॥ १८०॥
एकोनविंशतिपदैः परिधिः प्रप्रकीर्तितः । ज्ञेयेयं पञ्चमा पक्तिस्सप्तम्यङ्गं सप्तदशैः पदैः ॥ १८१॥


हिन्दी टीका (Hindi Commentary)

तीन पादका श्वेत चन्द्रमा बनाये। पाँच पादम... सुन्दर शृङ्खला बनाये। उसके दोनों बगल हरे रंगसे ग्यारह पादकी बल्लियाँ बनावे। इसके छह पादसे पीले रंगका शृङ्खला बनावे और सोलह पादस दोनों ओर भद्र बनावे, जिसका रंग लाल रक्खे ॥ १६३-१६४॥ तदनन्तर अट्ठारह पादसे सफेद वापिय बनाये। अठ्ठारह पादस काले रंगका नौ लिङ्गोंकी रचना करे। इसके अनन्तर लाल रंगकी दो शृङ्खलायें बनावे, दो पादोंसे अलग और बीच दोषम हरे रंगकी शृङ्खला बनावे ॥ १६५-१६६॥ जिसमें कुल तीन पाद रहेंगे। वापीके मस्तकपर लाल रंगका दो पादोंका शृङ्खल हरे रंगकी बनेगी। आसपास तथा शिवके मस्तकपर सफेद रंगसे दो पादका शृङ्खला बनेगा। इसी तरह सर्वत्र जानना चाहिए। इसको परिधिर्या पीत वर्णका रहेगी। इस तरह सतासी पादोंकी पहली पंक्ति समाप्त हुई। अब तिहत्तर पादोंवाली दूसरी पंक्ति के विषयम कहते हैं ॥ १६८-१७०॥ इसमें चन्द्रमा, शृङ्खला तथा बल्लियाँ ये पूर्व पादतक समान रखें। बीस पादका भद्र और तेरह पादकी नौ वापियें बनेंगी। तरह ही पादोंसे भद्रके मस्तकपर आठ लिंग बनाये जायेंगे। इसी जगह दो पादोंसे लाल रंगकी दो शृङ्खलायें बनावे। दो पादसे पीली शृंखला और तीन पादकी हरी शृङ्खला बनावे। बापीके मस्तकपर कुछ लाल पाद रक्खे ॥ १७१-१७३॥ बाकी सब चीज पहली पंक्तिके समान ६१ पादोंसे बनेगी। दूसरी पंक्तिकी परिधि पील वर्णकी रहेगी। यह दूसरी पंक्ति समाप्त हो गयी ॥ १७४॥ उनसठ पादकी तीसरी पंक्ति रहेगी। छह पादोंस एक भद्र, सात लिंग और आठ वापिय बनावे। बाकी सब पहली पंक्तिकी तरह रहेगा। इसमें संतालिस पादोंका परिधि बनायी जायगी ॥ १७५॥ ॥ १७६॥ इस प्रकार तीसरी पंक्ति समाप्त हुई। अब चौथा पन्तिके विषयमे बख्यान है यह चौथी पंक्ति पैंतालिस पादोका रहेगी। १७७॥ इसमें बारह पादका एक भद्र बनेगा। पाँच वापियें बनेंगी। भद्रके मस्तकपर चार लिंग रहेंगे ॥ १७८॥ छः पादोस बिल्कुल लाल वणका बल्ली बनेगी तीन तीन पादोंकी परिधि बनेगी। इस तरह चौथी पंक्ति समाप्त हुई। पाँचवी पंक्ति कुल इक्कीस पादांकी रहेगी ॥ १७९॥ इसमें नौ पादका भद्र लिंगा, तीन वापियें बनेंगी और दो शिवकी रचना की जाएगी। भद्रके मस्तकपर लाल रंगकी तीन पादवाली