श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
श्रुत्वा श्रीरामगभ्भ्यार्थं ययौ वेगेन कैकयीम् । सर्वं वृत्तं निवेद्याथ तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ॥४०॥
तच्छ्रुत्वा कैकयी चापि तस्मै भूषणमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे वाण्या देववाक्यानुमोदिता ॥४१॥
मन्था दृष्ट्वा तु कैकेयीं मन्थेर्येन्याह सा पुनः । मूढे कथंन्व तुष्टाऽसि हतभाग्याऽसि वेद्यहम् ॥४२॥
रामे राज्यपदं प्राप्ते कौसल्यायाश्च कैकयि । दासी भविष्यसि त्वं हि अतो मद्वचनं कुरु ॥४३॥
वरणं न्यासभूतेन राज्यं श्रीभरताय हि । नृपं प्रार्थय रामस्य द्वितीयेन वरेण च ॥४४॥
दंडकारण्यगमनं चतुर्दश समाः वदा । क्रोधागारं प्रविश्याद्य कुरुष्व यन्मयेरितम् ॥४५॥
तन्मन्थरोक्तं स्वहितं मन्त्वा सापि तथाऽकरोत् । मोहिता मायविवेकन श्रीरामवृत्तरेच्छया ॥४६॥
ततो निशायां राजा मा ज्ञात्वा कोधगृहास्थिता । गत्वा तत्र नृपः शीघं ददर्श कैकयीं तदा ॥४७॥
विकीर्यमाणकेशां तां त्यक्ताऽलङ्करणमदनाम् । भूमौ शयाना तां दृष्ट्वा ज्ञात्वा तस्या मनोरथम् ॥४८॥
रामाय दंडकारण्यं यैवराज्यं सुताय च वराभ्यां याचितं ज्ञात्वा हेत्युक्त्वा मूच्छितोऽभवत् ॥४९।
पश्चात् तन्मुखवेगो वृत्तं श्रुत्वा नृप ययौ । कैकेयी मन्त्रिणा पृष्टा सुमंत्रं प्राह सा तदा ॥५०॥
श्रीमानयश्व श्रीरामं द्रष्टुं न वांछते नृपः सोऽप्याह गतं नृपतेमपृष्ट्वा नानयाम्यहम् ॥५१॥
तदा शनैर्नृपः प्राह शीघ्रमानय राघवम् । सुमंतोऽप्यानयामास राघव पार्थिवाज्ञया ॥५२॥
तता रामो नृप गत्वा श्रुत्वा कैकेयजागिग । आत्मानं दंडके वास वरदानं पितुः पुरा ॥५३॥
तथेत्यांगीचकारार्थ नृपं वचनमब्रवीत् । ता ते शोकोऽस्तु हे तात बैह गच्छामि दण्डकान् ॥५४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा हाहेत्युक्त्या नृपोऽब्रवीत् मा विहाय कथं घोरं विपिनं गन्तुमिच्छसि ॥५५॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सांत्वयामास राघवः । अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य शीघ्रं यास्यामि ते गृहम् ॥५६॥
• ० पृष्ठा • ३९॥ उनके मुखसे समग्र राज्याभिषेकका नाम सुनकर वह शीघ्र कैकयीके पास गयी और सब वृत्तांत सुनाकर क्षण भर चुपचाप रहगयी ॥ ४० ॥ इसके बाद सुनकर कैकेयीने उसको अपना एक आभूषण दे दिया। इतनेमें देववाणीद्वारा प्रेरणा तथा मन्थराकी मतिमें प्रवेश कराकर उस डराती हुई कहने लगी अरे मूढ़े! गामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर तू प्रसन्न क्यो हुई? ऐसा ज्ञात होता है कि तेरा भाग्य नुक्सान हो गया है। यदि रामको राज्य मिल गया तो आ कैकयी ! बहा कौसल्याकी दासी बनना पडेगा। इस कारण जा मै कहूँ, वैसा कर ।। ४१॥ ४२॥ अपने पति राजा दशरथके पास जाकर रखे हुए दो वरोंमेंसे एकत्र द्वारा तू भरतके लिये राज्य माँग और दूसरे वरके द्वारा चौदह वर्षके लिए रामका पैदल दण्डकारण्यगमन माँग तू अभी कोपभवनमें चली जा ॥ ४३-४५ ।। उसने भी श्रीरामचन्द्र तथा देवताओकी इच्छासे और अविवेकके कारण मोहित मन्थराके उस कथनको अपना हितकारक समझकर वैसा ही किया ।। ४६ ।। सायंकालके समय जब राजाको ज्ञात हुआ कि कैकेयी कोपभवनमें है, तब वे उनक पास गये और देखा कि कैकेयी सिरके बाल खोले, भूषण तथा वस्त्रांको फेंककर धरणीपर पडी हुई है पश्चात जब राजा दशरथने उसका अभिप्रायको जाना तो उक्त कथनानुसार दो वरोंप्रथम एक द्वारा रामका दण्डकारण्यवास और दूसरके द्वारा भरतको यौवराज्य दानका दाल स्वीकार करके मूच्छित हो गये ॥ ४७-४९ । प्रातः काल मंत्री सुमंत्र इस वृत्तान्तको सुनकर राजाके पास गये सुमन्त्रके पूछनेपर कैकयीने कहा ॥ ५० ॥ राजा रामको देखना चाहते हैं। जाओ, उन्हें यहाँ बुला लाओ। सुमन्त्रने कहा कि राजासे बिना पूछे मै रामको यहाँ नहीं ले आ सकता ॥ ५१ । तब राजाने धीरेसे कहा कि 'रामको शीघ्र ले आओ।' सुमंत्र भी महाराजकी आज्ञासे शीघ्र रामको ले आये ।। ५२ ।। रामने राजाके पास आकर कैकेयीकी वाणीसे अपने दण्डकारण्यवास तथा पिताका पूर्वकालमें वरदान देनेका हाल सुना तो 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया उन्होंने राजासे कहा--हे तात ! आप शोक न करे, मै अभी दण्डकारण्य जाता हूँ ।। ५३ ।। ५४ ।। रामका वचनसुनकर राजा दशरथ कहने लगे - हे राम ! मुझको छोडकर तुम बनमें कैसे जाओगे ? ॥ ५५ । पिताके इस करुण वचनको सुनकर राम उन्हें