श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 728 of 811
Read in contextसर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७११
श्रीरामचन्द्र उवाच
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । पातु प्रतीच्यां रक्षोघ्नः पातु सागरपारगः ॥ १ ॥
उदीच्यामूर्ध्वतः पातु केसरीप्रियनन्दनः । अधस्तु विष्णुभक्तस्तु पातु मध्यं च पावनिः ॥ २ ॥
लङ्काविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम् । सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनन्दनः ॥ ३ ॥
भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् । नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥ ४ ॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिङ्करः । नासाग्रमञ्जनीसूनुः पातु वक्त्रं दरास्यहृत् ॥
वाचं रुद्रप्रियः पातु जिह्वां पिङ्गललोचनः ॥ ५ ॥
पातु दन्तान् फाल्गुनेष्टश्चिबुकं दैत्यदर्पहा । पातु कण्ठं च रक्षोहा स्कन्धौ पातु सुरारिहा ॥ ६ ॥
भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः । नखान् नखायुधः पातु कुक्षी पातु कपीश्वरः ॥ ७ ॥
वक्षो मुद्रपहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः । लङ्काविभञ्जनः पातु पृष्ठं मे निरन्तरम् ॥ ८ ॥
नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वानिलात्मजः । गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रियः ॥ ९ ॥
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः । जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः ॥
अचलोद्धारकः पातु पादौ मर्कटलोचनः ॥ १० ॥
अङ्गान्यमितसत्त्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलींस्तथा । सर्वाङ्गानि महावीरः पातु रोगाच्च सर्वदा ॥ ११ ॥
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद्विद्वान्विचक्षणः । स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२ ॥
त्रिकालमेककालं वा पठेन्मन्त्रमिमं सदा । सर्वान् रिपून क्षणाज्जित्वा सपुत्रान् श्रियमवाप्नुयात् ॥ १३ ॥
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि । क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयविनाशनम् ॥ १४ ॥
अब हनुमत्कवच प्रारम्भ होता है । श्रीरामचन्द्र बोले-हनुमान् पूर्व दिशाकी रक्षा करें, पवनात्मज दक्षिण दिशाकी रक्षा करें और रक्षोघ्न (राक्षसोंका नाश करनेवाले) नैऋत्य कोणकी पश्चिम दिशाकी रक्षा करें । १ । समुद्रको पार करनेवाले हनुमान्जी उत्तर दिशाकी रक्षा करें, केसरीप्रियनन्दन ऊर्ध्व भागकी, विष्णुभक्त अधो भागकी रक्षा करें, पवननन्दन मध्यभागकी रक्षा करें । २ । सब प्रकारकी आपत्तियोंसे लङ्काको जलानेवाले रक्षा करें, सुग्रीवके मन्त्री मस्तककी रक्षा करें, वायुनन्दन मस्तककी रक्षा करें, महाबल महाभागकी भालकी रक्षा करें, छायाका अपहरण करनेवाले दृष्टिफलकी रक्षा करें । ४ ॥ कपोलोंकी श्रीरामके दास रक्षा करें, श्रीरामचन्द्रजीके सेवक कानके मूल भागकी रक्षा करें, नासिकाके अग्रभागका अञ्जनीसूनु रक्षा करें, मुखपर मुखकी रक्षा करें ॥ ५ ॥ रुद्रप्रिय वाक्यकी रक्षा करें, पिङ्गललोचन जिह्वाकी रक्षा करें, अर्जुनके मित्र श्रीहनुमान्जी चिबुकभागकी रक्षा करें, दंतोंकी रक्षा करें, राक्षसोंका नाश करें, चरणसे आयुधका काम लेनेवाले हाथोंकी रक्षा करें, नखके आयुध धारण करनेवाले नखोंकी रक्षा करें, कपियोंके ईश्वर कुक्षिकी रक्षा करें ॥ ६ ॥ ७ ॥ मुद्रिका अपहरण करनेवाले हृदयकी रक्षा करें, भुजाओं ही शस्त्रका काम लेने-वाले पार्श्वभागकी रक्षा करें, लङ्काका विनाश करनेवाले मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ८ ॥ रामके दूत नाभिभाग-की रक्षा करें, वायुके पुत्र कटिभागकी रक्षा करें, महाबुद्धिमान्जी गुह्यभागकी रक्षा करें शिवके प्रिय लिंगकी रक्षा करें ॥ ९ ॥ लंकाके प्रासादोंका नाश करनेवाले दोनों तथा जानुभागकी रक्षा करें, कपिश्रेष्ठ जंघेकी रक्षा करें, महाबलवान् गुल्फभागकी रक्षा करें ॥ १० ॥ पर्वतोंको उठानेवाले मेरे दोनों पैरोंकी रक्षा करें, सूर्यके समान कपिराज श्री हनुमान्जी मेरे समस्त अंगोंकी रक्षा करें, अमित बलवान् हनुमान्जी मेरे पैरकी अंगुलि-योंकी रक्षा करें, महाशूरवीर मेरे सब अङ्गोंकी रक्षा करें, ज्ञानाग्नि जलनेवाले हनुमन्जी मेरे शरीरको समस्त रोगोंसे रक्षा करें ॥ ११ ॥ जो भी विद्वान् विद्वान् इस हनुमत्कवचका पाठ करता है, वही सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ होता है और सारी मुक्ति-मुक्ति सबको मिलती है ॥ १२ ॥ जो मनुष्य तीनों काल अथवा एक ही कालमें इस हनुमत्कवचका पाठ करता है, वह सब शत्रुओंको पराजित करके अतुल लक्ष्मीका भंडार प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ यदि आधी रातके समय जलमें खड़ा होकर सात बार इस कवचको पाठ करे तो क्षय, अपस्मार, कुष्ठ एवं दैहिक, दैविक और भौतिक ये तीनों प्रकारके ताप दूर हो जाते हैं ॥ १४ ॥