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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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७१२ आनन्दरामायणे [ सर्ग १३

अश्वत्थमूलेऽर्कवारे स्थित्वा पठति यः पुमान् । अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयं तथा ॥१५॥
बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगताम् । सुदृढ्यं वाक्यपुष्टत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत् ॥१६॥
मारणं वैरिणां सद्यः शरणं सर्वसम्पदाम् । शोकस्य हरणे दक्षं वन्दे तं रणदारुणम् ॥१७॥
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु सर्वत्र विजयी भवेत् । यः करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ॥१८॥
स्थित्वा तु बन्धने यस्तु जपं कारयति द्विजैः । तत्क्षणात्मुक्तिमाप्नोति निगडात् तथैव च ॥१९॥

ईश्वर उवाच

माणिक्योद्भासपादद्वितययुगलं कौपीनमौञ्जीधरं काञ्चीश्रेणिधरं दुकूलवसनं यज्ञोपवीताजिनम् ।
हस्ताभ्यां धृतपुस्तकं च विलसद्धारावलिं कुण्डले वक्षस्थलं विस्तीर्णं प्रसन्नवदनं श्रीवायुपुत्रं भजे ॥२०॥
यो वारांनिधिमल्पपल्वलमिवोल्लङ्घ्य प्रतापान्वितो वैदेहीघनशोकनापहरणो वैकुण्ठभक्तप्रियः ।
अक्षायोजितराक्षसेन्द्रमदहा रणे सोऽयं वानरपुङ्गवोऽवतु सदा योऽस्मान् समीरात्मजः ॥२१॥

वज्रांगं पिंगनेत्रं कनककनकमलत्कुण्डलाक्रान्तगण्डं
दम्भोलीस्तंभसारं प्रहरणमुखरीभूत रक्षोधिनाथम् !
उद्यल्लांगूलसप्तप्रचलचलधरं भीममूर्तिं कपीन्द्रं
ध्यायेत्तं रामचन्द्रं अमरवरकरं सञ्चसारं प्रसन्नम् ।२२।

वज्रांगं पिंगनेत्रं कनककमलम्-कुण्डलै शोभनीयं
सर्वाधीशंय दिनाथं करतलत्रिधृतं पूर्णकुम्भं दृढं वा ।
भक्तानामिष्टकारं विदधति च सदा सुप्रसन्नं हरीशं
त्रैलोक्यत्रातुकामं सकलभुवि गतं रामदूतं नमामि ॥२३॥


जो मनुष्य रविवारको पीपलके नीचे बैठकर इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे अचल लक्ष्मी प्राप्त होती है और वह विजयी होता है । १५ ।

बुद्धि, बल, यश, धैर्य निर्भीकत्व, अरोगिता, दृढता और वाक्यचापल्य, ये सब हनुमान्जीके ध्यानसे प्राप्त हो सकते हैं ॥ १६ ॥

जो सब वैरियोंको मारनेवाले और सब संपत्तियोंके निदान हैं, जो शोकका अपहरण करनेमें अतिशय कुशल हैं, मैं उन रणदारुण हनुमान्जीको प्रणाम करता हूँ ॥ १७ ॥

जो मनुष्य लिखकर इस कवचका पूजन करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है और जो अपनी भुजाओंमें हमेशा बाँधे रहता है, उसे लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ १८ ॥

यदि प्राणी किसी तरह बन्धनमें पड़ गया हो, वह ब्राह्मणों द्वारा इस कवचका जप कराये तो तत्क्षण बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥

शिवजी बोले—सूर्य और चन्द्रमाके समान शोभासम्पन्न जिनके चरणकमल हैं, जो कौपीन और मौञ्जी धारण किये हैं, जो कांची श्रेणियों को पहने हैं, वस्त्र धारण किये हैं यज्ञोपवीत तथा मृगचर्म अलग सुशोभित रहा है, जो हाथमें पुस्तक लिये हैं और चमकता हुआ हार जिनके वक्षस्थलपर सुशोभित हो रहा है ऐसे प्रसन्न मुखवाले वायुपुत्रको मैं प्रणाम करता हूँ ।

जो समुद्रको एक साधारण तलैया समझकर लाँघ गए, जिन्होंने सीताके महाशोक और तापको हर लिया, विष्णु भगवान्‌को भक्तिके प्रेमी, संग्राममें अक्षयकुमार आदि उद्दण्ड राक्षसोंके दर्पको दूर करनेवाले वानर पुंगव तथा वायुके पुत्र हनुमान् हमारी रक्षा करें।

जिनका वज्रके समान शरीर है, पीली-पीली आँखें हैं, सुवर्णमय कुंडलोंसे जिनका कपोलभाग भरा हुआ है, वज्रके स्तंभके समान जिनका मजबूत शरीर है, रावणका मारनेके लिए जिन्हें तुरन्त शस्त्र मिल गया था, उन पूंछ ऊपर उठाये सात पर्वतोंको लादे और भयङ्कर रूपधारी हनुमान्‌जीका ध्यान करना चाहिये । साथ ही उन श्रीरामचन्द्रजीका भी ध्यान करना उचित है, जो सब सत्त्वोंके सार हैं और सदा प्रसन्न रहते हैं । २०–२२ ॥

वज्रके समान कठिन जिनकी देह है सुवर्णके कुंडल जिनके कानों में पड़े हैं, जो सब आभूषणोंके स्वामी हैं, जिन्होंने अपनी हथेली में पूर्णकुम्भको धारण कर रक्खा है, जो भक्तोंकी कामना पूर्ण करते हैं, जो सर्वदा प्रसन्न रहते हैं और तीनों लोकोंकी रक्षा करनेकी कामना रखते हैं, समस्त भुवनमें