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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 81 of 811

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सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ६५


तान् रामः क्षणमात्रेण चतुर्दशशार्यमम्। संप्रदर्श्य निजं लोकं प्रेषयामास लीलया ॥५९॥
तान् राक्षसान् मृतान् श्रुत्वा खगद्यास्ते त्रयः क्रुधा। युद्धाय निर्ययुः सैन्यैः सहिताश्च चतुर्दश ॥६०॥
रामोऽपि वधूं सीतां च गुहायां स्थाप्य बेगतः। चकार राक्षसैर्युद्धं शस्त्रैरस्त्रैर्भयावहम् ॥६१॥
चतुर्दशसहस्राणि शरीरूपाणि राघवः। कृत्वा तेषां च पुरतः शरैस्तान्मर्दयन्खगान् ॥६२॥
हन्ता खर दूषण च तथा त्रिशिराः शरैः। चतुर्दशसहस्रांस्तान्प्रेषयामास स्व पदम् ॥६३॥
मुहूर्तेन तु रामेण सहस्राणि चतुर्दश। मिता सेना खराद्यैश्च निहता गौतमीतटे ॥६४॥
खराद्याः कटका यत्र स्थितास्तच्च त्रिकटकम्। क्षेत्रं ख्यातं त्र्यंबकस्य तदेव प्रानपते भुवि ॥६५॥
जनस्थानं भृगुगणां ददौ वस्तुं रघूद्वहः। अथ सीता समालिङ्ग्य राघवं प्रशशंस सा ॥६६॥
अथ तां जानकीं प्राह रामो रहसि सादरम्। सीते त्वं त्रिविधा भूत्वा रजोरूपा वमानले ॥६७॥
वामांङ्गे मे सत्वरूपा बस छाया तमोमयी। पञ्चवट्यां दशाम्यस्य मोहनार्थं वमात्र वै ॥६८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा सीता चकार सा। ततः सूर्पणखा लंकां गत्वा रावणमब्रवीत् ॥६९॥
धिक् त्वां राक्षसराजात्र वृत्तं चरैर्न वेत्सि यः। चतुर्दशसहस्रा सा सेना स्वद्वन्धुभिः सह ॥७०॥
मानुषेणैव रामेण जनस्थाने निपातिता। तस्याश्च वचनं श्रुत्वा तां दृष्ट्वा तादृशीं तदा ॥७१॥
सिंहासनारूढश्चालय पुनः पप्रच्छ तां स्वसाम्। वद किं कारणं युद्धे प्राह सा राक्षसेश्वरम् ॥७२॥
सुरम्भां जानकीं दृष्ट्वा मया चित्ते विचिंतितम् गवणार्ये विनेष्यामि धतुं तां तत्पुरोगता ॥७३॥
शारद्वाजेन सीताऽह दशास्येन तु रावण। सौमित्रिणा वचव्यामात्तथा राघवस्य च। ७४॥
मायोऽपि मे हतः पुत्रस्तण्डपानो निर्धवरूप। मत्ताणार्थं कृतं युद्ध वधुभिस्ते निपातिताः। ७५॥

यह देखकर त्रिशिरा, खर और दूषण उनके मुखसे सब समाचार सुनकर क्रोधयुक्त हो चौदह भयानक राक्षसोंको उसी समय रामसे लड़नेके लिये भेजा ॥ ५७ । ५८॥ तब रामने चौदह बाणोंसे क्षणमात्रमं लीला-पूर्वक उनको मारकर अपने लोक भेज दिया ॥ ५९ ॥ उनके मारे जानेका समाचार सुनकर खर आदि तीनों राक्षस क्रुद्ध होकर चौदह हज़ार मतिकोंके साथ युद्धके लिए निकल पड़े ॥ ६० ॥ राम भी सीता तथा लक्ष्मणको एक गुफामे रखकर शीघ्र अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए राक्षसोंके साथ भयानक युद्ध करने लगे ॥ ६१ ॥ उस समय राम अपने चौदह हज़ार रूप बनाकर उनके सामने गये और समरभूमिमें उन सबका मर्द मर्दन कर डाला ॥ ६२ ॥ उन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा तथा चौदह हज़ार राक्षसोंको बाणोंसे मारकर अपने धाम भेज दिया ॥ ६३ । इस प्रकार मुहूर्त्तमात्रमें रामने चौदह हज़ार सैनिकों तथा खर आदिको गौतमी तटपर किनारे मार डाला ॥६४॥ जहाँ ये खरा दूषण त्रिशिरा तीनों भाई कटक रूपसे रहते थे। वह स्थान त्रिकटक न मस प्रसिद्ध था और उसीको लोग त्र्यम्बक भी कहते थे ॥ ६५ ॥ तदनन्तर रघुनन्दन रामने वह स्थान त्रिकटक ( त्र्यम्बक ) ब्राह्मणोंको निवास करनेके लिए दान दे दिया । यह सब देखकर सीता रामका आलिंगन करके उनकी प्रशंसा करने लगीं ॥ ६६ ॥ एक दिन राम एकान्तम सीताके सादर कहने लगे—हे सते ! तुम तीन रूपोंको धारण करके रजोरूपमे अग्निम समायरूपसे छायाकी तरह मेरे वायें अगमें और तमोमयी बनकर रावणको मोहित करनेके लिये यहीं पञ्चवटीमें निवास करो ॥ ६७ । ६८ ॥ उत्तर उस बचनको सुनकर सीतान वैसा ही किया । तभी शूर्पणखा लंकामें जाकर रावणसे बोली — ॥ ६९ ॥ हे राक्षसराज ! तुम्हारे जैसे राजाको धिक्कार है, जो दूतोंके द्वारा तुम्हें राज्यकी दशाका पता नहीं लगता । चौदह हज़ार सेना सहित तुम्हारे भाइयोंको मनुष्यरूपवाले रामने दण्डकारण्यमे मारकर गिरा दिया । उसके इस बचनको सुन तथा उसका यह दशा देख सिंहासनसे कुछ ऊंचे होकर वह अपनी बहिनसे पूछने लगा कि युद्ध होनेका क्या कारण है, सो बतलाओ । तब वह राक्षसेश्वर रावणसे बोली— । ७०-७२ ॥ विदर्भोंमें परम लावण्यमयी देखकर मैने निश्चय किया था कि इसको रावणके लिये ले आऊँगी । यह विचारकर मैं उसकी पकड़नेके लिये आगेमें गयी ॥ ७३ ॥ हे रावण ! इतनेहीम एक बाणने मेरी यह दशा कर दी । रामके