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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 82 of 811

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Page 82

६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७

यद्यस्ति पौरुषं किञ्चित्तार्ह सीतां समानय । नोचेदधोमुखस्तिष्ठ यथा स्त्री हतभर्तृका ॥ ७६ ॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मान्वयामास तां स्वसाम् । तौ रामलक्ष्मणौ हत्वा तव शोकाप्रमार्जनम् ॥ ७७ ॥ करोम्यहं लोहितेन तयोः स्नेटं भजस्व मा । एव नानाविधैर्वाक्यैः सान्त्वयित्वा स्वसां मुहुः ॥ ७८ ॥ स्वहितस्योपदेष्टारं मातुलं तपसि स्थितम् । ययौ रथेन मारीचं तस्मै वृत्तं न्यवेदयत् ॥ ७९ ॥ सोऽथ तं भीषयामास नाभिनपं मुहुर्मुहुः । विश्वामित्राध्वरे त्यक्तमात्मानं तं न्यवेदयत् ॥ ८० ॥ रामारण्या परां रत्नं रजतं ह्यवधूपितम् । श्रुत्वाऽत्र र्याद्ववर्णञ्चिद्राप मन्त्रं बिभेम्यहम् ॥ ८१ ॥ केन ते शिक्षिता बुद्धिरियं लङ्काविघातिनी । आम्ररूपोऽस्ति कः शत्रुर्येनेयं शिक्षिता मतिः ॥ ८२ ॥ कथां न कुरु रामस्य तं दृष्ट्वा न्वं मरिष्यसि । ततः क्रोधेन तं प्राह यदि नायासि राघवम् ॥ ८३ ॥ मया सद्यो वधिष्यासि त्वामतः कुरु मद्वचः । धृत्वा त्वं मृगरूपञ्च गवस्त्वमनुयास्यति ॥ ८४ ॥ त्वं शब्दं कुरु रामस्य लक्ष्मणस्तेन यास्यति । ततस्तां जानकीं वेगाल्लङ्कां स्वामानयाम्यहम् ॥ ८५ ॥ लङ्कार्द्धं ते दास्यामि स्वां राज्यादशुभादहन् । इति तस्याग्रहं दृष्ट्वा मारीचो ह्यचिन्तयत् ॥ ८६ ॥ रामहस्तान्मृतिः श्रेष्ठा माऽस्तु रावणहस्ततः । इति निश्चित्य मारीचस्तथेत्युक्त्वा ययौ तदा ॥ ८७ ॥ रावणेन रथे स्थित्वा गत्वा पञ्चवटीं प्रति । धृत्वा हैममृगाधीत्री मोहयामास जानकीम् ॥ ८८ ॥ सा दृष्ट्वा तामनी दृष्ट्वा शृम शवद्रममब्रवीत् । क्रीडार्थं मां मृगं हेम धन्वा देहि रघूत्तम ॥ ८९ ॥ मृगश्चेद्वानभिन्नांगः करोमि कंचुकीं स्वयः । तत्तस्या रचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा गर्व रघूत्तम । ९० ॥

कहलक्ष्मणने पंचवटीमें डेरो पड़ रहा सो है ॥ ७४ ॥ उन्होंने बिना किसी कारण तपस्या कर। हुए मेरे प्राण-प्रिय पुत्र सम्बकको भी मार डाला । तब युद्ध कलह करनेके लिए खर-दूषणादि भाईयात रामके साथ युद्ध किया । किन्तु उसने उन्हें भी मार डाला ॥ ७५ ॥ यदि ऐसे तुझे भी बल हो तो सीताका हरण कर नहीं तो पतित मर जानपर विधवा स्त्रीकी तरह नीचा मुंह करके बैठा रह ॥ ७६ ॥ उसवे वचन सुनकर रावण अपनी बहिनको समझाने लगा और बोला कि मैं राम-लक्ष्मणको मारकर उनके खूनसे तुम्हारे आंसूओंका माजन करूंगा-तुम दुःखित न होना । इस प्रकार अनेक वाक्योंसे उसने भगिनीको सान्त्वना समझाया ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ इसके पश्चात् रथपर बैठकर वह हितका उपदेश करनेवाले तथा तपमें स्थित अपने मामा मारीचके पास गया और उसे सब हाल कह सुनाया ॥ ७९ ॥ तब मारीच अपने भाव रावणको बार-बार डराता हुआ बोला कि रामने मुझे विश्वमित्रके यज्ञके समय बाणसे उठाकर समुद्रके किनारे फेंक दिया था ॥ ८० ॥ तभी से मैं रण, रन, रजत (चांदी), रमम, सभा, तथा रमणी आदि नामोंके रकार अक्षर सुनने मात्रसे ही डर जाता हूँ (अर्थात् रामके भयसे मैंने इन सब चीजोंसे प्रेम करना भी छोड़ दिया है ॥ ८१ ॥ लंकाका नाश करनेवाली यह मंत्रणा तुमको किसने दी है ? वह मित्ररूपमें छिपा हुआ तुम्हारा शत्रु ही है, जिसने तुमको यह मति दी है ॥ ८२ ॥ उसकी बात मत सुनो, नहीं तो मारे जाओगे । यह सुना तो शुद्ध होकर रावण मारीचसे बोला-यदि तुम रामके पास नहीं जाओगे तो मैं तुम्हें मार डालूंगा। इसलिये मेरा कहा मान सो ! तुम मृग बनकर जब रामके पास जाओगे तो राम तुम्हारे पीछे चल देगा । वनमें दूर से जाकर तुम रामके जैसा स्वर बनाकर 'हा लक्ष्मण' ऐसा चिल्लाना । तब लक्ष्मण भी आश्रम छोड़कर तुम्हारे ओर चल देंगे। उस समय मैं शीघ्र से ताको अपनी लंकामें उठा लाऊंगा ॥ ८३-८५ ॥ यदि मेरा कार्य सिद्ध हो जायगा तो मैं तुमको लंकाका आधा राज्य दे दूंगा। उसके आग्रहको सुनकर मारीचने मनमें विचार किया कि रावणके हाथसे मरनेकी अपेक्षा रामके हाथसे मरना अच्छा है। यह निश्चय करके मारीच 'बहुत अच्छा' कहता हुआ रथपर सवार होकर रावणके साथ पंचवटीकी उसी समय चल पड़ा। वहीं जाकर उसने सुवर्णका मृग बनकर सीताको मोहित कर लिया ॥ ८६-८८ ॥ तब अमोलगमयी छपारूपवाणी सीता मृगको देखकर रामसे बोलीं- हे रघूत्तम राम ! इस मृगको पकड़कर मुझे दे दो। मैं उसके साथ क्रीड़ा करूंगी ॥ ८९ ॥ और यदि बाणसे मारकर ला हो तो मैं उसके चमड़ेकी कांचली बनाऊंगी। सीताके वचन सुन उपा कुछ सोर-समझकर रघूत्तम राम सीताकी रक्षाके लिये भाई लक्ष्मणको