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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 85 of 811

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अद्यापि दृश्यते स्पष्टा नदीरूपा भयप्रदा पाषाणभूम्यां तत्रैव रावणस्य पदं महत् ॥१२६॥ अद्यापि दृश्यते सौम्यं गर्तशूर्पं नरोत्तमैः । खरादेर्युद्धसमये पंचवट्यां विदेहजा । १२७॥ गुहायां गोषिता भर्त्रा साद्यापि तत्र दृश्यते । यथा रामो लक्ष्मणोऽपि पञ्चवट्यां सदैव हि ॥१२८॥ दृश्यतेऽद्यापि भो देवि सञ्जनैर्ज्ञानदृष्टिभिः । अज्ञानदृष्टिभिन्ने तु दृश्यते प्राकृतरूपिणः । १२९॥ रामतीर्थ रामकृतं सीतालक्ष्मणसंस्कृतैः । तोयैस्तत्र तु सांतव्यै दृश्यतेऽद्यापि मानवः ॥१३०॥ रामेण सीतया यत्र शय्यायां पर्णनोपरि । कृत पूर्व तु शयनं रामशय्यागिरिः स्मृतः । १३१॥ शय्यारूपाणि दृश्यंतेऽद्यापि तत्र तृणानि हि । रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा श्रुत्वा सीतावधोद्यमम् ॥१३२॥ निवेदितं लक्ष्मणेन क्रोधाद्वाष्पपयेनसा । निमित्तान्यनिष्टोराणि दृष्ट्वा चैव समन्ततः ॥१३३॥ परी पञ्चवटीं पश्यंस्तत्र सीता ददर्श न । ततो मानुषभाव तु दर्शयन् सकलाजनान् ॥१३४॥ विचिन्वन्सर्वतः सीतां गृध्रराजं ददर्श सः । अतः स पश्चितन्वा रावणन हतां प्रियाम् ॥१३५॥ ज्ञात्वा तं योजयामास वह्निना जीवितक्षये । तत्तृप्त्यर्थं कव्यमांसं क्षिप्त्वा स्नात्वा रघूत्तमः ॥१३६॥ ययौ दक्षिणमार्गेण विचिन्वन्मूढवत्प्रियाम् । पुरंदराग्निहोत्र स चकार कुशभार्यया ॥१३७॥ एतस्मिन्नंतरे देवि त्वया प्रोक्तस्त्वहं पुरा । ध्या यस्य जपो नित्यं क्रियते राघवरूप हि । १३८॥ सोऽयं स्त्रीविरहादद्य मूढोवद्भ्रमते वने । तवेति वचनं श्रुत्वा तदा त्वामनुवं त्वहम् ॥१३९॥ देवि साक्षान्महाविष्णुश्चैष रामो वहात्मने । शिक्षार्थ सकलाँल्लोकान् मूढवद्भ्रमते वने ॥१४०॥ नार्यांसगो नरेस्त्याज्यः सर्वदाऽवेति शिक्षयन् । स्त्रीविषयज दुःसमीरस्य चमत्कारकम् । १४१॥ दर्शयन् सकलाँल्लोकानिति मांड्वाटते वने । इति मद्वचनं श्रुत्वा तन्परीक्षार्थमुद्यता ॥१४२॥

यहाँ पाषाणभूमि, पथरीली चरणा, वा रामबाणसे निवृत्त हुआ मृग गिरा था ॥ १२१-१२५ ॥ उसका चिह्न वहाँ आज भी मनुष्योंको दिखाई देता है । मुनिप्रणव लक्ष्मणके धनुष द्वारा खींचा हुआ रेख पञ्चवटीके चारो बार आज भी भयानक नदीरूप धारण हुए स्पष्ट दिखाई देता है । उस पाषाणमयी भूमिमे रावणका बड़ा भारी पदचिह्न एक बड़े भारी गड्ढेके रूपमे अब भी दिखाई दे रहा है। पड़ने करके वाण युद्ध करनेके समय पञ्चवटाम विदेहजा सीताको जिस गुफाम उनके पति रामने छिपाया था, वह भी विद्यमान है। * देवि ! सज्जन तथा ज्ञानी महात्माओको सदैव राम लक्ष्मणका वहीं दर्शन होता है और सामान्य स्थापित लोगों इस समय भ.. दिखाई देते है ॥ १२६-१३० ॥ जिस पवनपर रामने शय्या निर्माण करके सीताके साथ शयन किया था वह रामशय्यागिरिके नामस प्रसिद्ध है ॥ १३१ ॥ वहाँके तृण आज भी शय्याकार दिखाई देते है । इधर गगन लक्ष्मणको आया देखा तथा उनके मुखसे सीताके कष्ट हरणनेको सुना । १३२ ॥ यह सब वृत्त लक्ष्मणने क्रोधपूर्वक आँसू बहाते हुए तथा विस्मयके साथ कहा था । राम बारा बार अत्यन्त भयानक शकुनोंको देख तथा घबराकर शीघ्र ही पञ्चवट म गये तो वहाँ सीता नहीं दिखाई दी । पश्चात् मनुष्यभावसे वे समस्त वनके पशु-पक्षी वृक्ष वृक्षों आदिसों सीताका पता पूछन और सीताको सर्वत्र ढूंढने लगे । इतनेमें गृध्रराज जटायु दिखाई दिया । उस पक्षीके मुँहसे सुना कि रावण प्रिया सीताका हरण कर ले गया है ॥ १३३-१३५ ॥ मरणोपरान्त जटायुके कथनानुसार रामने उसका अग्निसंस्कार किया । उसकी शान्ति तथा तृप्तिके लिए रामने वन्य मृग आदिके मांससे पिण्डदान किया और स्नान आदि क्रिया की ॥ १३६ ॥ पश्चात् सर्वेश्वर राम मूढ पुरुषकी तरह सीताको खोजते हुए दक्षिणकी ओर चले । रास्ते में तृण अभावमे कुशाकी सीता बनाकर उषाके साथ रामने अग्निहोत्र किया ॥ १३७ ॥ इसी बीच हे देवि पार्वती ! तुमने मुझसे प्रश्न किया था-हे प्रभो ! आप जिसपत्ति जिन रामका नाम जपा करते हैं ॥ १३८ ॥ वही राम स्वार्क विरहसे मूढकी तरह वनमे मारे-मारे फिर रहे हैं । तुम्हारा यह वचन सुनकर मैने तुमसे कहा- ॥ १३९ ॥ हे देवि ! यह साक्षात् विष्णु भगवान् राम बनकर पूर्वोक्तमण्डलके संगोंको शिक्षा देनेके लिए वनमें मूढकी तरह भ्रमण कर रहे हैं ॥ १४० ॥ वे सबको यह उपदेश देते हैं कि मनुष्यको स्त्रीमे आसक्त नहीं होना चाहिए । स्त्रीविषयक आसक्ति ऐसे ही दुःख