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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 86 of 811

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Page 86
७०आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

त्वं गताऽसि समीपं श्रीराघवस्य तदा वने । सीमारूपेण तं रामं त्वया प्रोक्तं शुभं वचः ॥१४३॥
राम राजीवपत्राक्ष मामग्रे पश्य जानकीम् । क्रीडन्वाऽत्र मया सार्धमेहि शीघ्रं सुखी भव ॥१४४॥
इत्युक्तो राघवः श्रुत्वा विहस्य त्वां वचोऽब्रवीत् जानाम्यहं त्वां काऽसीति सीतान्वं नसि वेद्म्यहम् १४५
त्वं किं सीतास्वरूपेण मोहयस्यत्र मां वने । एवं पुनः पुनः प्रोक्ता यदा त्वं राघवेण हि ॥१४६॥
तदा त्वया तत्स्वरूपं तत्त्वं सत्यं मयेरितम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं प्रार्थयित्वा पुनः पुनः ॥१४७॥
आगताऽसि पुनर्मां त्वं कैलासशिखरेऽमले । त्वं का त्वं किमिति प्रोक्ता राघवेण पुनः पुनः ॥१४८॥
या त्वं सा दंडके जाता म्बिकानाम्नांबिका वने । त्व लज्जिताऽसि शंभोण यत्र तत्र त्वय स्थले ॥१४९॥
वस्त्रलापुरनाम्नाऽभून्मन्नगरं दंडके वने । ततस्तौ रामसौमित्री जग्मतुर्दाक्षणां दिशम् ॥१५०॥
बहवो निहता मार्गे राक्षसा घोररूपिणः एतस्मिन्नन्तरेऽरण्ये कबन्धेन धृतौ तदा ॥१५१॥
श्रीरामलक्ष्मणौ मार्गे योजनायतबाहुना । दृष्ट्वं तं शिरसा हीनं बाहू विच्छेदतुर्मुदा ॥१५२॥
ततः स दिव्यरूपोऽभून्नत्वा रामं वचोऽब्रवीत् । पुरा गन्धर्वराजोऽहं ब्रह्मणो वरदानतः ॥१५३॥
केनाप्यवध्यस्त्वद्यस्यहस्यमणारके मुनीश्वरम् । रक्षो भवेति शप्तोऽहं मुनिना प्राह मां पुनः ॥१५४॥
त्रेतायुगे यदा रामलक्ष्मणौ योजनायतौ । छेत्स्यतस्ते महाबाहू तदा शापान्प्रमोक्ष्यसे ॥१५५॥
ततो राक्षसरूपेणाहमिन्द्रमभ्यद्रवं रुषा । सोऽपि वज्रेण मां राम शिग्देशे क्षताडयत् ॥१५६॥
तदा कुक्षौ शिरःपादयुगलं च गतं क्षणात् । अबद्धस्तन्मन्मुखभृन्मे वज्रताडनात् ॥१५७॥
मुखाभावं कथं जीवेदयमित्यभ्रगाधिपः । दृष्ट्वा मां प्राह कृपया जठरे ते मुखं भवेत् ॥१५८॥
बाहू ते योजनायामावद्य शीघ्रं भविष्यतः । तदत्तवशात्र राक्षस्या लब्ध तद्भक्षयाम्यहम् ॥१५९॥

तया अन्यत्र कारण बदता है ॥१४१॥ इन बातोंका जनकने तथा सीताका शिक्षा देनके लिए राम वनमें इधर-उधर भ्रमण कर रहे हैं। मेरे इस उत्तरको सुनकर तुम उनके पास, लेनका उद्यत हुई ॥१४२॥ उस समय तुम सीताका रूप बनाकर श्रीरामके पास गयी और उनसे कहा- ॥१४३॥ हे कमलसदृश नेत्रोंवाले राम ! अपने सामने खड़ी मुझ जानकीको देखो। आओ, मेरे साथ इस वनमें क्रीडा करके सुख प्राप्त करो ॥१४४॥ तुम्हारे कथनको सुनकर राम हंसे और कहा मैं जानता हूं कि तुम कौन हो ॥१४५॥ आर्य सीताका रूप धारण करके मुझ बनमें क्यों भटका रही हो ? इस प्रकार जब रामने बारम्बार कहा ॥१४६॥ तब तुमने मेरे कहनेके अनुसार रामका वास्तविक स्वरूप पहिचाना और उनकी पुनः पुनः प्रार्थना करके क्षमा मांगी ॥१४७॥ १४८॥ तदनन्तर तुम रमणीक कैलास पर्वतके शिखरपर मेरे पास लौट आयीं। जहाँपर रामने तुमसे पूछा था कि तुम कौन हो ? यहाँ क्यों आयी हो और तुम्हारे नामकी अम्बिका तो दण्डकारण्यमें रहती है। यह सुनकर तुम लज्जित हुईं। जिससे वहाँपर लज्जापुर नामका एक नगर बस गया। तदनन्तर वे राम-लक्ष्मण दक्षिणकी ओर चल दिये ॥१४९॥ १५०॥ उन्होंने मार्गमें बहुत-से घोर राक्षसोंको मारा। इसी जङ्गलमें कबन्धने उन दोनोंको पकड़ लिया ॥१५१॥ उसके चार-चार कोसके लम्बे हाथ थे उसे सिरसे रहित देखकर उनके दोनों हाथ राम-लक्ष्मणने काट डाले ॥१५२॥ तब वह दिव्य रूप धारण करके नमस्कारपूर्वक रामसे कहने लगा-पहले मैं गन्धर्वोंका राजा था। ब्रह्मा ने मुझे वर दिया था कि तुमको कोई नहीं मार सकेगा। इस गर्वमें मैं एक दिन मुनीश्वर अष्टावक्रका रूप देखकर हंस पड़ा। इसपर उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझको शाप दिया कि तू राक्षस हो जायगा। मेरे प्रार्थना करनेपर फिर वे बोले- ॥१५३॥ १५४॥ त्रेता युगमें जब राम-लक्ष्मण तेरी इन योजन भर विस्तारवाली भुजाओंको काटेंगे, तब तू शापसे मुक्त हो जायगा ॥१५५॥ राक्षस होकर एक दिन मैंने इन्द्रके ऊपर धावा किया। उन्होंने कुपित होकर मेरे मस्तकपर वज्र मारा ॥१५६॥ जिससे मेरा सिर और दोनों पाँव पेटमें घुस गये। परन्तु ब्रह्मा का वरदान प्राप्त रहनेसे मेरी मृत्यु नहीं हुई ॥१५७॥ तब मैंने देवताओंके अधिपति इन्द्रसे प्रार्थना की कि मैं बिना मुखके किस प्रकार जी सकूँगा। तब उन्होंने कृपा करके कहा कि जा, तेरे पेटमें मुख हो जायगा ॥१५८॥