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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 90 of 811

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Page 90
७४आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

दशयोजनपर्यन्तं तथा बाणेन वै पुनः । चक्राकारान् सप्त तालान् दृष्ट्वा देहे महोः प्रभुः ॥३५॥
स्वोयांशुष्ठेन पीमितैः पदं किंचिद्विपर्य्ययम् । ऋजुं कृत्वा पन्नगं तं शेषांशेन स्थित भुवि ॥३६॥
सुग्रीवप्रत्ययार्थं हि सप्त तालान् बिभेद सः । गुहायामर्कदा तालफलादि स्थापितनि हि ॥३७॥
बलिना मम नीतानि तेन सर्पं ददर्श सः । नमश्चपञ्चापि वृक्षाश्च भविष्यन्तीति वानरः ॥३८॥
सर्पिण्याहृद्य तान् छेत्ता यस्ते हन्ता न संशयः तद् दृष्ट्वा रामसामर्थ्यं तस्मिन्प्रत्ययमाप सः ॥३९॥
सुग्रीवस्त पुनः प्राह राघवं तुष्टमानसः वालिन सुगनाधेन पुरा दत्ताऽस्ति मालिका ॥४०॥
यां दृष्ट्वा रिपवो युद्धे गनवीर्या भवन्ति हि । या पुरा कश्यपेनैव तपसा दूकरण च ॥४१॥
शिवाल्लब्धा पिता पुत्रमिन्द्रं सेनापि वालिने । प्रीत्या दत्ता मालिका सा चल कण्ठे दधान्यसौ ॥४२॥
तस्यास्त्वं दर्शनाद्राम शत्रुमग्णो भविष्यसि तत्रापायं विन्त्यस्व येन तेऽद्य जयो भवेत् ॥४३॥
तस्यैवं वचनं श्रुत्वा रामः सर्प तमब्रवीत् । यः शामन्मोचनः पूर्वं मम नालेनबिभ्य च ॥४४॥
गच्छ त्वं मम शापेन किष्किन्धायां भयालिनम् । निर्भयो निद्रितं दृष्ट्वा हर तन्मालिकां शुभाम् ॥४५॥
तथैव रामवाक्येन किष्किन्धांपेत्य पन्नगः मचकण्ठा सम्हृत्य ता मालां वायवे ददौ ॥४६॥
ततो रामाज्ञया गत्वा समाहूयाथ वालिनम् । युद्धं चकार सुग्रीवः श्रीरामोऽपि ददर्श तम् ॥४७॥
समानरूपौ तौ दृष्ट्वा मित्रघातविशङ्कया न मुमोच तदा बाणं गमः सोऽपि न्यवर्त्तत ॥४८॥
सुग्रीवो राघवं प्राह मां घातयसि वालिना । यदि मद्वधनं वाञ्छा त्वमद्य जहि मां विभो ॥४९॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य रघूत्तमः । बन्धय मास सुग्रीवकण्ठे मालां तु बन्धुना ॥५०॥


दूर फेंक दिया ॥ ३४ ॥ वह दस योजनकी दूरीपर जा गिरा। फिर आकाशमें सबने गोलाकार जमे हुए सात तालवृक्षोंको देखा तब रामने पृथ्वी पर शेषके अंशसे स्थित पन्नगके नीचेका अपना पाँवके अङ्गूठेसे दबाकर उस सर्पको सीधा किया और बाणसे उन सात वृक्षोंको एक ही बारमें काट डाला ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ऐसा करके उन्होंने सुग्रीवका विश्वास दिलाया कि राम में सहायता करने और वालीको मारनेमें समर्थ हैं। तब समयकी बात है कि वालीने अपनी गुफामे तालके कुछ फल रक्खे थे। उन्होंने नागफण कोई उठा ले गया। वालीने कहा तो उस गुहाँ फलोंको ज्योंका त्यों लाके रख दिया। तब नागाने सुग्रीवको शाप दे दिया कि सा तेरो ऊपर सात ताल वृक्ष उगेंगे ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तब सर्पने भो कहा कि जो इन वृक्षोंको काटेगा, वही तुम मारेगा -इसमें सन्देह नहीं है। इसी सामर्थ्यको आज राममें देखकर सुग्रीवको विश्वास हो गया ॥ ३९ ॥ तब प्रसन्न होकर सुग्रीवने कहा- पूर्वसमयमें इन्द्रने वालीको एक माला दी थी, ४० ॥ जिसे देखकर इसके शत्रु युद्धमें बलहीन हो जाते हैं। कठिन तपस्या तय करनेपर वह माला कश्यपको शिवजीसे मिली थी। कश्यपजी से वह अनमोल पुत्र इन्द्रको दी और इन्द्रने वालीको अर्पण की। प्रीतिपूर्वक अर्पित की हुई उस मालाको बाली सदा गलेमें पहिने रहता है ॥ ४१, ४२ ॥ हे राम ! उसको देखकर शायद आप भी कर्महीन हो जावेंगे। अतएव इस विषयमें कोई उपाय सोचिए जिससे आपकी विजय हो ॥ ४३ ॥ सुग्रीवके इन वचनोंको सुनकर राम, जिसको बाणके द्वारा सात तालवृक्षोंको काटकर शापसे मुक्त किया था उस सर्पसे कहा कि तुम मेरे कथनानुसार किष्किन्धा-में जाकर रात्रिके समय जब कि बाली सोता रहे तब इसके गलदेशसे उस सुन्दर मालाको चुरा लाओ ॥ ४४ । । ४५ । 'तथास्तु' कहकर वह साँप रामके आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नगरीमें गया और चुपचाप से उस मालाको चुराकर इन्द्रको दे आया ॥ ४६॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे सुग्रीवने बालीके पास जाकर उसको युद्ध के लिये ललकारा और युद्ध किया। उस युद्धको राम देख रहे थे किन्तु उन दोनों भाइयोंको समान रूपवान् देख धोखेसे कहीं मित्र सुग्रीव ही न मारा जाय इस आशङ्काके कारण रामने बालीपर बाण नहीं छोड़ा। तब सुग्रीव रामके पास लौट आया और रामसे बोला कि मुझे आप वालीके हाथों क्यों मरवाना चाहते हैं? यदि मुझे मारनेकी ही इच्छा हो तो हे विभो ! आप ही मार डाल ॥ ४७-४९ ॥ सुग्रीवके इस वचनको सुनकर