Skip to content
BharatKosha
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

Page 91 of 811

Read in context
Page 91

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् [ ७५

पुनस्तं प्रेषयामास सोऽपि वालिनमाह्वयत् । ततः श्रुत्वा ययौ वाली तं ताराऽप्रार्थयत्तदा ॥५१॥
सुग्रीवस्याङ्कितेन भ्राता रामः समागतः । चकार मैत्रीं किं तेन मा कुरुष्वाद्य संगरम् ॥५२॥
गच्छ नत्वा रमानायं बन्धुं मानय सादरम् । यौवराज्यपदं देहि तन्मे वचनं शृणु ॥५३॥
तत्तारावचनं श्रुत्वा वाली तां श्लक्ष्णमब्रवीत् । जानाम्यहं राघवं न नररूपधरं हरिम् ॥५४॥
तस्य हस्तान्मुक्तिमस्मि गच्छामि परमं पदम् । तूष्णीं त्वं तिष्ठ तारेऽत्र सुग्रीवं भज मन्मदा ॥५५॥
यदा त्वया म सुग्रीवः कल्पितां गति विधेये । तदा त्वत्पाणिग्राहस्यानुष्यं गच्छामि भामिनि ॥५६॥
अत एव मालिका मे गुञ्जाऽऽभूषयदस्य सन्प्रिये । अद्याहं रामबाणेन पातिष्यामि रणाङ्गणे ॥५७॥
अद्य धन्याऽस्म्यहं तारे धन्यौ नौ पितरौ मम । योग्यं श्री रामहस्तेन मरिष्यामि रणाङ्गणे ॥५८॥
एवमाश्वास्य तां मार्गं ययौ वाली त्वरान्वितः । दृष्ट्वा वाली महोत्पातान् सन्तोषं परमं ययौ ॥५९॥
चकार बन्धुना युद्धं तदा बाणेन राघवः । वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा पातयामास तं भुवि ॥६०॥
ततस्तारा समागत्य शुशोच वालिनं प्रति । रामं दृष्ट्वा रमानायं तदा प्राह स गद्गदः ॥६१॥
वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा मय्याऽर्के तद्दिने हृदि । स्वाद्य दृष्ट्वा जनं मम जातो महोदयः ॥६२॥
किं मयाऽपकृतं ते हि त्वया यन्माऽसि पातितः । रामः प्राह वालिनं त्वं रूमाया लम्पटः सदा । ६३।
बन्धुभार्यां गृहे स्थाप्य बन्धु हन्तुं त्वमिच्छसि । दूषणं म्ना समालोक्य मया त्वन्माऽसिपातितः ॥६४॥
यथा त्वया रुमा भुक्ता तथा तारां तव प्रियाम् । भोक्ष्यत्यद्य हि सुग्रीवो वचनान्मे कपीश्वर । ६५।
यद्यपि त्वं दुराचारो निहतोऽसि रणे मया । तथापि भिल्लरूपेण द्वापरान्तेऽथवाऽथ मन ॥६६॥
भित्त्वा प्रभासे बाणेन पूर्ववैरेण वानर । तदा मद्धस्तमरणान्मोक्ष कारणान्मोक्षवाग् ॥६७॥
मुक्तिं गच्छसि त्वं वालिन शुभां जन्मान्तराद्धि हि । ततः प्राह पुनर्वाली मद्धस्तव्यथदुह्यास्तम् ॥६८॥


तब रामने भाई लक्ष्मणके द्वारा उस (द्वन्द्वयुद्धके लिए सुग्रीवको भेजा) । तदनन्तर पुनः लंका युद्ध करनेके लिये नगाड़ा बजवाकर फिर बाली को ललकारा । सुग्रीव का वह नाद सुनकर ताराने प्रार्थनापूर्वक कहा कि, हे नाथ! आपके एक सुग्रीव ही नहीं, बल्कि उनके साथ राम इस समय आये हैं । इसलिये आप प्रभावक साथ मित्रता कर और उनके लिए यौवराज्य पद देकर उनके चरणोंकी वन्दना कर और मेरा कहना मानकर भाई को अपना सादर युवराज पद प्रदान करो ॥५३॥ तारा की बात सुनकर बालीने कहा कि, हे प्रिये ! यदि साक्षात् श्रीभगवान् राम आये हैं तो उनके हाथों यदि मुझे मृत्यु मिले तो परमपद प्राप्त करूंगा । तू यहाँ पर चुपचाप बैठकर उसका ध्यान करना हे प्रिये ! जब तुम सुग्रीवके साथ सोवोगी, तब मैं उसका फलक भोग करूंगा ॥५६॥ अरे भामिनि ! देखो, आज गुंज माला से सजकर सुग्रीव आया है इससे मैं समझता हूँ कि मैं अवश्य ही रामके बाणसे मारा जाऊंगा । ५७ ॥ हे तारे ! मैं तथा मेरे दोनों पितर धन्य हैं कि जो आज श्रीरामके हाथों मरूँगा ॥५८॥ इस प्रकार ताराको समझाकर बाली युद्धके लिये बढ़ा और बहुत उत्पातोंको देखकर प्रसन्न हुआ ॥५९॥ तब अपने भाई सुग्रीवके साथ युद्ध किया । तब श्रीरामने वृक्षकी ओटमें खड़े हो गये और बाली को बाणसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया । तब तारा आकर पति के लिये अत्यन्त विलाप करने लगी। वालीने अपने नगरके स्वामी रामचन्द्रजीको देखकर गद्गद कंठसे कहा - ॥ ६१ ॥ हे नाथ ! आपने जो बाण मुझको मारा है उससे मेरे हृदय में आज आपके दर्शन हुए इससे मेरे लिये तो यह महान् अभ्युदयकी बात है, परन्तु इसपर आपका भारी अपयश होगा ॥६२॥ दूसरा बात यह है कि मैंने आपका कौनसा अपराध किया था, जो आपपर मुझ मारा ? रामने कहा - तू सदा मद्य देवात्मा रुमा में लिप्त रहता था ॥ ६३ । तू छोटे भाईकी पत्नीको अपने घरमें रखकर भाईको मार डालना चाहता था। यह दुराचार देखकर मैंने तुझे मारा है तो भी तू अंतमें भील होकर तू पूर्ववैरको स्मरण करके प्रभासक्षेत्रमें अपने बाणसे मुझे पोढ़ावेगा। तब मरण