आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहेद्र ने देखा दस्यु गाते-गाते रोने लगा। तब महेद्र ने विस्मय से पूछा- "तुमलोग कौन हो?" भवानंद ने उत्तर दिया - "हमलोग संतान है।" महेद्र - "संतान क्या? किसकी संतान है?" भवानंद - "माता की संतान!" महेद्र - "ठीक ! तो क्या संतान लोग चोरी-डकैती करके मां की पूजा करते है? यह कैसी मातृभक्ति?" भवानंद - "हम लोग चोरी-डकैती नही करते........" महेद्र - "अभी तो गाड़ी लूटी है......?" भवानंद - "यह क्या चोरी-डकैती है! किसके रुपये लुटे है?" महेद्र - "क्यो ? राजा के !" भवानंद - "राजा के ! वह क्यो इन रुपयो को लेगा- इन रुपयो पर उसका क्या अधिकार है?" महेद्र - "राजा का राज-भाग।" भवानंद- "जो राजा राज्य प्रबंध न करे, जनता-जनार्दन की सेवा न करे, वह राजा कैसे हुआ?" महेद्र- "देखता हूं, तुम लोग किसी दिन फौजी की तोपो के मुंह पर उड़ जाओगे।" भवानंद - "अनेक साले सिपाहियो को देख चुका हूं, अभी आज भी तो देखा है!" महेद्र - "अच्छी तरह नही देखा, एक दिन देखोगे!" भवानंद - "सब देख चुका हूं। एक बार से दो बार तो मनुष्य मर नही सकता।" महेद्र - "जान-बूझकर मरने की क्या जरूरत है?" भवानंद - "महेद्र सिंह! मेरा ख्याल था कि तुम मनुष्यो के समान मनुष्य होगे। लेकिन देखा- जैसे सब है, वैसे तुम भी हो- घी-दूध खाकर भी दम नही। देखो, सांप मिट्टी मे अपने पेट को घसीटता हुआ चलता है- उससे बढ़कर तो शायद हीन कोई न होगा; लेकिन उसके शरीर पर भी पैर रख देने पर वह फन काढ लेता है। तुम लोगो का धैर्य क्या किसी तरह भी नष्ट नही होता? देखो, कितने देशी शहर है- मगध, मिथिला, काशी, कराची, दिल्ली, काश्मीर- उन जगहो की ऐसी दुर्दशा है? किस देश के मनुष्य भोजन के अभाव मे घास खा रहे हैं? किस देश की जनता कांटे खाती है, लता-पत्ता खाती हैं? किस देश के मनुष्य स्यार, कुत्ते और मुर्दे खाते है? आदमी अपने संदूक मे धन रखकर भी निश्चित नही है- सिंहासन पर शालिग्राम बैठाकर निश्चित नही है- घर मे बहू- नौकर-मजदूरनी रखकर निश्चित नही है! हर देश का राजा अपनी प्रजा की दशा का, भरण-पोषण का ख्याल रखता है; हमारे देश का मुसलमान राजा क्या हमारी रक्षा कर रहा है? धर्म गया, जाति गई, मन गया- अब तो प्राणो पर बाजी आ गई है। इन नशेबाज दाड़ीवालो को बिना भगाए क्या हिंदू हिंदू रह जाएंगे?" महेद्र- "कैसे भगाओगे?" भवानंद - "मारकर!" महेद्र- "तुम अकेले भगाओगे- एक थप्पड़ मारकर क्या?" भवानंद ने फिर गाया- "सप्तकोटि कण्ठ कलकल निनादकराले, द्विसप्तकोटिभुजैर्धृत खरकरवाले, अबला केनो मां एतो बले।"