आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहेंद्र -“किंतु देखता हूं, तुम तो अकेले हो?’’ भवानंद-“क्यो, अभी तो दो सौ आदमियो को देख चुके हो।” महेंद्र-“क्या वे सब संतान है?’’ भवानंद-“हां सब संतान है।” महेंद्र-“और कितने लोग है?’’ भवानंद-“इसी तरह हजारो है। धीरे-धीरे और बढ़ेगे।” महेंद्र-“बहुत होगा, दस-बीस हो जाओगे- लेकिन क्या इतने से ही मुसलमान भाग जाएंगे? क्या वे सहज ही राज्यच्युत होगे?’’ भवानंद-‘‘पलासी में अंग्रेजो की फौज कितनी थी?’’ महेंद्र -‘‘अंग्रेज और बंगाली बराबर है?’’ भवानंद -‘‘न कैसे बराबर होगे? शरीर मे अधिक बल होने से क्या गोला ज्यादा तेज चलता है?’’ महेंद्र-‘‘तब अंग्रेजो और मुसलमानो मे इतना अंतर क्यो है?’’ भवानंद -‘‘मान लो एक अंग्रेज प्राण जाने पर भी भागता नही, लेकिन एक मुसलमान पसीना होते ही भागता है, शरबत की खोज करता है। इसके बाद मान लो, अंग्रेज जो करना चाहते है, करके छोड़ते है, उनमें लगन होती है, लेकिन मुसलमान आरामतलब होते हैं, रुपयो के लिए प्राण देते हैं- उस पर तनखाह भी तो नही पाते। सबसे अंतिम बात यह है कि अंग्रेज साहसी होते है। एक गोला एक ही जगह जाकर गिरेगा, दस जगह नही, अतः एक गोले को देखकर दस आदमियो के भागने की क्या जरूरत है? एक गोले के छूटते ही मुसलमान फौज-की-फौज भागती है। लेकिन सैकड़ो गोले देखकर भी एक अंग्रेज तो नही भागता।.....’’ महेंद्र-‘‘तुम लोग मे ये सब गुण हैं’’ भवानंद -‘‘नही, लेकिन गुण पेड़ो मे फलते तो नही, अभ्यास से ही आते हैं’’ महेंद्र -‘‘तुम लोग क्या अभ्यास करते हो??’’ भवानंद -‘‘देखते नही हो, हम लोग सन्यासी हैं! हमारा सन्यास इसी अभ्यास के लिए है। कार्योंद्धार होने पर, अभ्यास पूरा होने पर, हम लोग फिर गृहस्थ हो जाएंगे। हम लोगो के भी स्त्री-कन्या सब है।” महेंद्र -‘‘तुम लोग उन सबको त्यागकर माया-मोह से परे हो सके हो?’’ भवानंद -‘‘संतान झूठ नही बोला करते- तुम्हारे सामने मे मिथ्या बड़ाई करना नही चाहता- माया से परे कौन हो सकता है? जो कहे कि हमने माया काट दी है, शायद उसे माया-ममता कभी रही ही नही, या वह मिथ्यावादी है। हम माया से परे नही हुए है, लेकिन हम लोग अपने इस व्रत की रक्षा करते है। तुम संतान बनोगे?’’ महेंद्र -‘‘बिना अपनी स्त्री-कन्या का पता पाए और मिले, मैं कुछ नही कर सकता।” भवानंद -‘‘चलो, तुम अपनी स्त्री-कन्या को देखोगे? चलो!’’ दोनो शांत राह चुपचाप तय करने लगे। भवानंद ने फिर वंदेमातरम् गाना शुरू किया। महेंद्र का गला भी सुरीला था, संगीत मे कुछ अभ्यास और रुचि भी थी, अतः वे भी साथ ही गाने लगे। उन्होने देखा कि यह अपूर्व देशगीत गाते-गाते आंखो मे जल आने लगता है। तब महेंद्र ने कहा -‘‘यदि स्त्री-कन्या का त्याग न करना पड़े तो इस व्रत मे मुझे भी दीक्षित कर लो!’’ भवानंद -‘‘यह व्रत जो लेता है, उसे स्त्री-कन्या का त्याग करना ही पड़ता है। तुम यदि यह व्रत लेना चाहोगे, तो स्त्री-कन्या से मुलाकात करने न पाओगे! उनकी रक्षा के लिए उपयुक्त प्रबंध कर दिया जाएगा,