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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

by बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

DevanagariHindipublished78 pages

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लेकिन व्रत की सफलता तक उनका मुखदर्शन नही मिलेगा।'' महेन्द्र-‘‘तब मैं यह व्रत ग्रहण न करूंगा।’’ सबेरा हो गया है। वह जनहीन कानन अब तक अंधकारमय और शब्दहीन था। अब आलोकमय प्रातः काल मे आनंदमय कानन के ‘आनंद-मठ’ सत्यानंद स्वामी मृगचर्म पर बैठे हुए संध्या कर रहे हैं। पास मे भी जीवानंद बैठे हैं। ऐसे ही समय महेन्द्र को साथ में लिए हुए स्वामी भवानंद वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मचारी चुपचाप संध्या मे तल्लीन रहे, किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। इसके बाद संध्या समाप्त हो जाने पर भवानंद और जीवानंद दोनो ने उठकर उनके चरणो मे प्रणाम किया, पदधूलि ग्रहण करने के बाद दोनों बैठ गए। सत्यानंद इसी समय भवानंद को इशारे से बाहर बुला ले गए। हम नही जानते कि उन लोगो मे क्या बाते हुई। कुछ देर बाद उन दोनों के मंदिर मे लौट आने पर मंद-मंद मुसकाते हुए ब्रह्मचारी ने महेन्द्र से कहा- ‘‘बेटा! मैं तुम्हारे दुःख से बहुत दुःखी हूं। केवल उन्हीं दीनबंधु प्रभु की ही कृपा से कल रात तुम्हारी स्त्री और कन्या को किसी तरह बचा सका।’’ यह उन्ही ब्रह्मचारी ने कल्याणी की रक्षा का सारा वृत्तांत सुना दिया। इसके बाद उन्होंने कहा-‘'चलो वे लोग जहां हैं वही तुम्हे ले चले !’’ यह कहकर ब्रह्मचारी आगे-आगे और महेन्द्र पीछे देवालय के अंदर घुसे। प्रवेश कर महेन्द्र ने देखा- बड़ा ही लंबा चौड़ा और ऊंचा कमरा है। इस अरुणोदय काल मे जबकि बाहर का जंगल सूर्य के प्रकाश मे हीरों के समान चमक रहा हैं, उस समय भी इस कमरे मे प्रायः अंधकार है। घर के अंदर क्या है- पहले तो महेन्द्र यह देख न सके, किंतु कुछ देर बाद देखते-देखते उन्हे दिखाई दिया कि एक विराट चतुर्भुज मूर्ति है, शंख-चक्र- गदा-पद्मधारी, कौस्तुभमणि हृदय पर धारण किए, सामने घूमता सुदर्शनचक्र लिए स्थापित है। मधुकैटभ जैसी दो विशाल छिन्नमस्तक मूर्तियां खून से लथपथ सी चित्रित सामने पड़ी हैं। बाएं लक्ष्मी आलुलायित- कुंतला शतदल-मालामाणिडता, भयत्रस्त की तरह खड़ी हैं। दाहिने सरस्वती पुस्तक, वीणा और मूर्तिमयी राग- रागिनी आदि से घिरी हुई स्तवन कर रही हैं। विष्णु की गोद मे एक मोहिनी मूर्ति-लक्ष्मी और सरस्वती से अधिक सुंदरी, उनसे भी अधिक ऐश्वर्यमयी- अंकित हैं। गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षसगण उनकी पूजा कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ने अतीव गंभीर, अतीव मधुर स्वर मे महेन्द्र से पूछा-‘‘सब कुछ देख रहे हो?’’ महेन्द्र ने उत्तर दिया-‘‘देख रहा हूं’’ ब्रह्मचारी-‘‘विष्णु की गोद मे कौन हैं, देखते हो?’’ महेन्द्र-‘‘देखा, कौन हैं वह?’’ ब्रह्मचारी -‘‘मां!’’ महेन्द्र -‘‘यह मां कौन है?’’ ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया -‘‘हम जिनकी संतान हैं। ’’ महेन्द्र -‘‘कौन हैं वह?’’ ब्रह्मचारी -‘‘समय पर पहचान जाओगे। बोलो, वंदे मातरम्! अब चलो, आगे चलो !’’ ब्रह्मचारी अब महेन्द्र को एक दूसरे कमरे मे ले गए। वहां जाकर महेंद्र ने देखा- एक अद्भुत शोभा-संपन्न, सर्वाभरणभूषित जगद्धात्री की मूर्ति विराजमान है। महेन्द्र ने पूछा-‘‘यह कौन हैं?’’ ब्रह्मचारी-‘‘मां, जो वहां थी।’’ महेन्द्र-‘‘यह कौन हैं?’’ ब्रह्मचारी -‘‘इन्होने यह हाथी, सिंह आदि वन्य पशुओ को पैरो से रौंदकर उनके आवास-स्थान पर अपना

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