भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पद्मासन स्थापित किया। ये सर्वालंकार-परिभूषिता हास्यमयी सुंदरी है- यही बालसूर्य के स्वर्णिम आलोक आदि ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री हैं- इन्हे प्रणाम करो !’’ महेंद्र ने भक्तिभाव से जगद्धात्री-रूपिणी मातृभूमि-भारतमाता को प्रणाम किया। तब ब्रह्मचारी ने उन्हे एक अंधेरी सुरंग दिखाकर कहा-‘‘इस राह से आओ!’’ ब्रह्मचारी स्वयं आगे-आगे चले। महेंद्र भयभीत चित्त से पीछे-पीछे चल रहे थे। भूगर्भ की अंधेरी कोठरी मे न जाने कहां से हलका उजाला आ रहा था। उस क्षीण आलोक मे उन्हे एक काली मूर्ति दिखाई दी। ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘देखो अब मां का कैसा स्वरूप है !’’ महेंद्र ने कहा-‘‘काली?’’ ब्रह्मचारी-‘‘हां मां काली- अंधकार से घिरी हुई कालिमामयी समय हरनेवाली है इसीलिए नग्न है। आज देश चारो तरफ श्मशान हो रहा है, इसलिए मां कंकालमालिनी हैं- अपने ‘शिव’ को अपने ही पैरो तले रौंद रही हैं। हाय मां ! ब्रह्मचारी की आंखे से आंसू की धारा-बहने लगी।’’ ब्रह्मचारी -‘‘हमलोग संतान हैं। अपनी मां के हाथो मे अभी केवल अस्त्र रख दिए हैं। बोलो- वन्देमातरम् !‘‘ ‘वन्देमातरम्- कहकर महेंद्र ने मां काली को प्रणाम किया।‘ अब ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘इस राह से आओ !‘‘ यह कहकर वे दूसरी सुरंग मे चले। सहसा उन लोगो के सामने प्रातः सूर्य की किरणे चमक उठी, चारो तरफ मधुर से पक्षी कूंज उठे। सामने देखा, एक संगमर्मर से निर्मित विशाल मंदिर के बीच सुवर्ण-निर्मित दशभुज-प्रतिमा नव-अरूण की किरणा से ज्योतिर्मयी होकर हंस रही हैं। ब्रह्मचारी ने प्रणाम कर कहा-‘‘ये हैं मां, जो भविष्यत मे उनका रूप होगा। इनके दशभुज दशो दिशाओ मे प्रसारित हैं, उनमे नाना आयुधरूप मे नाना शक्तियां शोभित हैं। पैरो के नीचे शत्रु दबे हुए हैं, पैरो के निकट वीर-केशरी भी शत्रु-पीड़न से मग्न है।’‘ दिक्भुजा-‘‘कहते-कहते सत्यानंद गद्गद् हो रोने लगे- ‘‘दिक्भुजा- नानाप्रहरणधारिणी, शत्रुविमर्दिनी, वीरेन्द्रपृष्ठविहारिणी, दाहिने लक्ष्मी भाग्यरूपिणी, बाएं वाणी विद्याविज्ञानदायिनी- साथ मे शक्ति के आधार कार्तिकेय, कार्यसिद्धिरूपी गणेश- आओ, हम दोनो मां को प्रणाम करे !‘‘ इस पर दोनो ही हाथ जोड़कर माता का रूप निहारते हुए प्रार्थना करने लगे- ‘‘सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते ॥‘‘ दोनो के भक्ति-भाव से प्रणाम कर चुकने के बाद, भरे हुए गले से महेंद्र ने पूछा-‘‘ मां की ऐसी मूर्ति कब देखने को मिलेगी?‘‘ ब्रह्मचारी ने कहा -‘‘जिस दिन मां की सारी सन्ताने एक साथ मां को बुलाएंगी, उसी दिन मां प्रसन्न होगी।‘‘ एकाएक महेंद्र ने पूछा -‘‘मेरी स्त्री-कन्या कहां हैं ?‘‘ ब्रह्मचारी-‘‘चलो, देखोगे? चलो !‘‘ महेंद्र -‘‘उन लोगो से भी एक बार मैं मिलूंगा, इसके बाद उन्हे बिदा कर दूंगा।‘‘......... ब्रह्मचारी-‘‘क्यो बिदा करोगे?‘‘ महेंद्र -‘‘मै भी यह महामंत्र ग्रहण करूंगा!‘‘ ब्रह्मचारी -‘‘उन्हे कहां विदा करोगे?‘‘ महेंद्र ने विचारकर कहा-‘‘मेरे घर पर कोई नही है, मेरा दूसरा कोई स्थान भी नही है। इस महामारी के समय