भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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अपने-अपने हिस्से के गहने खींच-खीचकर दलपति के शरीर पर मारने लगे। दलपति ने भी दो-एक को मारा। इस पर सब मिलकर आक्रमण कर दलपति पर आघात करने लगे। दलपति अनाहार से कमजोर और अधमरा तो आप ही था, दो-चार आघार मे ही गिरकर मर गया। उन भूखे, पीड़ित, उत्तेजित और दयाशून्य डाकुओ मे से एक ने कहा--‘‘स्यार का मांस खा चुके हैं, भूख से प्राण जा रहा है, आओ भाई आज इसी साले को खा ले।’’ इस पर सबने मिलकर ‘‘जयकाली’’ कहकर जयघोष किया--‘‘जय काली ! आज नर-मांस खाएंगे।’’ यह कहकर वह सब नरकंकाल रूपधारी खिलखिलाकर हंस पड़े और तालियां बजाते हुए नाचने लगे। एक दलपति के शरीर को भूनने के लिए आग जलाने का इंतजाम करने लगा। लता-डालियां और पत्ते संग्रह कर, उसने चकमक पत्थर द्वारा आग पैदा कर उसे धधकाया; धधक कर आग जल उठी। आग की लपट के पास के आम, खजूर, पनस, नीबू आदि के वृक्षो के कोमल हरे पत्ते चमकने लगे। कही पत्ते जलने लगे, कही घास पर रोशनी से हरियाली हुई तो कही अंधेरा और गाढ़ा हो गया। आग जल जाने पर कुछ लोग दलपति के कंकाल को आग मे फेकने के लिए घसीटकर लाने लगे। इसी समय एक बोल उठा-‘‘ठहरो, ठहरो ! अगर यह मांस ही खाकर आज भूख मिटानी है, तो इस सूखे नरकंकाल को न भूनकर, आओ इस कोमल लड़की को ही भूनकर खाया जाए’’ एक बोला-‘‘जो हो, भैया ! एक को भूनो ! हम तो भूख से मर रहे हैं।’’ इस पर सबने लोलुप दृष्टि से उधर देखा, जिधर अपनी कन्या को लिए हुए कल्याणी पड़ी थी। उस सबने देखा कि वह स्थान सूना था, न कन्या थी और न माता ही। डाकुओ के आपसी विवाद और मारपीट के समय सुयोग पाकर कल्याणी गोद मे बच्ची को चिपकाए वन के भीतर भाग गई। शिकार को भागा देखकर वह प्रेत-दल मार-मार करता हुआ चारो तरफ उन्हे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा। अवस्था विशेष मे मनुष्य पशुमात्र रह जाता है। जंगल के भीतर घनघोर अंधकार है। कल्याणी को उधर राह मिलना मुश्किल हो गया। वृक्ष-लताओ के झुरमुट के कारण एक तो राह कठिन, दूसरे रात का घना अंधेरा। कांटो से विंधती हुई कल्याणी उन आदमखोरो से बचने के लिए भागी जा रही थी। बेचारी कोमल लड़की को भी कांटे लग रहे थे। अबोध बालिका गोद मे चीखकर रोने लगी; उसका रोना सुनकर दस्युदल और चीत्कार करने लगा। फिर भी, कल्याणी पागलो की तरह जंगल मे तीर की तरह घुसती भागी जा रही थी। थोड़ी ही देर मे चंद्रोदय हुआ। अब तक कल्याणी के मन मे भरोसा था कि अंधेरे मे नर-पिशाच उसे देख न सकेगे, कुछ देर परेशान होकर पीछा छोड़कर लौट जाएंगे, लेकिन अब चांद का प्रकाश फैलने से वह अधीर हो उठी। चन्द्रमा ने आकाश मे ऊंचे उठकर वन पर अपना रुपहला आवरण फैला दिया, जंगल का भीतरी हिस्सा अंधेरे मे चांदनी से चमक उठा- अंधकार मे भी एक तरह की उज्ज्वलता फैल गई- चांदनी वन के भीतर छिद्रो से घुसकर आंखमिचौनी करने लगी। चंद्रमा जैसे-जैसे ऊपर उठने लगा, वैसे-वैसे प्रकाश फैलने लगा जंग को अंधकार अपने मे समेटने लगा। कल्याणी पुत्री को गोद मे लिए हुए और गहन वन मे जाकर छिपने लगी। उजाला पाकर दस्युदल और अधिक शोर मचाते हुए दौड़-धूप कर खोज करने लगे। कन्या भी शोर सुनकर और जोर से चिल्लाने लगी। अब कल्याणी भी थककर चूर हो गई थी; वह भागना छोड़कर वटवृक्ष के नीचे साफ जगह देखकर कोमल पत्तियो पर बैठ गई और भगवान को बुलाने लगी-‘‘कहां हो तुम? जिनकी मैं नित्य पूजा करती थी, नित्य नमस्कार करती थी, जिनके एकमात्र भरोसे पर इस जंगल मे घुसने का साहस कर सकी.......‘‘ ...कहां हो, हे मधुसूदन !‘‘ इस समय भय और भक्ति की प्रगाढ़ता से, भूख-प्यास से थकावट से कल्याणी धीरे अचेत होने लगी; लेकिन आंतरिक चैतन्य से उसने सुना, अंतरिक्ष मे स्वर्गीय गीत हो रहा है-

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