भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

भवानन्द ने कहा - "कभी नही, जीवानंद ! तुम खड़े होकर तमाशा देखो । एक के भी जिंदा रहते भवानन्द वापस नही हो सकता। जीवानन्द! तुम्हे कसम हैं, खड़े होकर चुपचाप देखो। मै अकेले इन सबको मारूंगा।‘' अभी तक कप्तान टॉमस घोड़े पर बंधे हुए थे। भवानन्द ने आक्रमण के समय कहा - "उस अंगरेज को मेरे सामने रखो; पहले यह मरेगा, फिर मैं मरूंगा।" टॉमस हिन्दी समझता था। उसने अपने सिपाहियो को आज्ञा दी- "वीरो ! मै तो मरे के समान हूं। इंगलैण्ड की मान-रक्षा करना, तुम्हे मातृभूमि की कसम हैं! पहले मुझे मारो, इसके बाद प्रत्येक अंग्रेज मारकर अपनी जगह मरे।‘' '‘धांयं‘' एक शब्द हुआ और तुरन्त कप्तान टॉमस मस्तक मे गोली लगने से मरकर गिर पड़ा। यह गोली उसी के एक सिपाही द्वारा चलायी गयी थी। इसके बाद उन सबने आक्रमण किया। अब भवानन्द ने कहा -‘‘आओ भाई! अब कौन ऐसा है जो भीम, नकुल, सहदेव बनकर मेरे साथ मरने को तैयार है?‘' इतना कहते ही जीवानंद, धीरानंद और लगभग पचीस जवान आ पहुंचे। घोर युद्ध हो रहा था। तलवारे रही थी। धीरानंद, भवानंद के पास थे। धीरानंद ने कहा-‘‘भवानंद! क्यो? क्या मरने का किसी का ठेका हैं क्या?‘' यह कहते हुए धीरानंद ने एक गोरे को आहत किया। भवानंद-"यह बात नही? लेकिन मरने पर तो तुम स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिता न पाओगे!‘' धीरानंद-‘‘दिल की बात कहते हो? अभी भी नही समझे?‘‘ (धीरानंद ने आहत गोरे का वध किया)। भवानंद-‘‘नही‘‘ (इसी समय एक गोरे के आघात से भवानंद का बायां हाथ कट गया।) धीरानंद-"मेरी क्या मजाल थी कि तुम जैसे पवित्रात्मा से यह बाते मै कहता? मै सत्यानंद का गुप्तचर हो कर तुम्हारे पास गया था?‘‘ भवानंद उस समय केवल एक हाथ से युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह क्या? महाराज का मेरे प्रति अविश्वास?‘‘ धीरानंद ने उनकी रक्षा करते हुए कहा- "कल्याणी के साथ तुम्हारी जितनी बाते हुई थी,सब उन्होने स्वयं अपने कानो से सुनी।‘' भवानंद-"यह कैसे?‘‘ धीरानंद-‘‘वे स्वयं वहां उपस्थित थे। सावधान बच्चो! (भवानंद ने एक गोरे द्वारा आहत होकर उसे आहत किया) वे कल्याणी को गीता पढ़ा रहे थे, उसी समय तुम आ गए। सावधान!‘‘ (लेकिन इसी समय भवानंद का दाहिना हाथ भी कट गया।) भवानंद-"मेरी मृत्यु का समाचार उन्हे देना। कहना- मै अविश्वासी नही हूं।‘‘ धीरानंद आंखो से आंसू भरे हुए युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह वे जानते है। उन्होने मुझसे कह दिया है कि भवानंद के पास रहना, आज वह मरेगा। मृत्यु के समय उससे कहना कि मै आशीर्वाद देता हूं, परलोक मे तुम्हे बैकुण्ठ प्राप्त होगा।‘‘ भवानंद ने कहा-"संतानो की जय हो ! मुझे एक बार मरते समय 'वन्देमातरम्' गीत तो सुनाओ।‘‘ इस पर धीरानंद की आज्ञा पाकर समस्त उन्मत्त संतानो ने एक साथ 'वन्देमातरम्' गीत गाया। इससे उनकी भुजाओ मे दूना बल आ गया। इतनी देर मे अवशिष्ट गोरो का वध हो चुका था। रणक्षेत्र मे एक भी शत्रु न रह गया। हा! रमणी के रूप-लावण्य !....इस संसार मे तुझे ही धिक्कार हैं ! रण-विजय के उपरान्त नदी तट पर सत्यानंद को घेरकर विजयी सेना विभिन्न उत्सवो मे मत्त हो गयी। केवल सत्यानन्द दुःखी थे, भवानन्द के लिए।