अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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विवरण उपस्थापित किया है। ऐसे अवसरों को चरक ने 'बुद्धेविशेषपस्तत्रासीत्' कहा है। सच तो यह है— 'विद्या गुरुणां गुरुः'।
पाठभेद तथा प्रक्षिप्त पद्य—वैदिक वाङ्मय को छोड़कर परवर्ती सभी प्रकार के साहित्य में पाठभेदों तथा प्रक्षिप्त गद्यों तथा पद्यों की भरमार देखी जाती है। तद्विद्य विद्वान् भी प्रसंगोचित पाठभेद को देखकर उसके समर्थक हो जाते हैं। 'इदम् इत्थम्' ( यह ऐसा ही है ) की कोई कसीटी उनके पास भी नहीं होती। प्रस्तुत 'हृदय' की व्याख्या करते समय मैंने निर्णयसागरीय प्रति को अपने ग्रन्थ का मूल आधार माना है। उसमें भी जहाँ-जहाँ स्वल्म थे, उनको 'यथाबुद्धिबलोदय' ठीक करने का प्रयास किया है। फिर भी अनेक स्थानों पर ऐसा अनुभव हुआ है कि जो पाठ मूल में ( ऊपर ) होना चाहिए था वह पाठ नीचे टिप्पणी में दिया गया है। ऐसे पाठनिर्णयकों को मेषदूत के व्याख्याकार पूर्णसरस्वती ने इस प्रकार आड़े हाथों लिया है। देखें—
'सुकविवचसि पाठानन्यथाकृत्य मोहाद् रसगतिमवधूय प्रौढमर्थं विहाय। विबुधवरसमाजे व्याक्रियाकामुकानां गुरुकुलविमुखानां धृष्टताये नमोऽस्तु'॥
टीकाकारों की आलोचना—धारानगरी के सुप्रसिद्ध भोजराज ऐसे अधिकांश टीकाकारों की आलोचना करते हुए कहते हैं—जो पाठ उनकी समझ में नहीं आता, उसे 'इति स्पष्टम्' लिखकर छोड़ देते हैं और जो पाठ स्वयं स्पष्ट है, उसकी निरर्थक समास, विग्रह आदि द्वारा विस्तार से व्याख्या कर दिया करते हैं। इनके अतिरिक्त जहाँ आवश्यकता नहीं है, वहाँ अनुपयोगी विषयों को डालकर पढ़ने तथा सुनने वालों के मन में प्रायः सभी टीकाकार भ्रम उत्पन्न कर देते हैं। यथा—
'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थमित्युक्तिभिः स्पष्टार्थेष्विति विस्तृति विदधति व्यर्थः समासादिभिः। अस्थानेऽनुपयोगिभिश्च बहुभिर्जल्पैर्भ्रमं तन्वते श्रोतृणांमितिवाक्यविप्लवकृतः सर्वेऽपि टीकाकृतः॥ ( भोजराजकृत राजमार्तण्ड )
यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमाद्रि आयुर्वेद जगत् में स्वनाम धन्य प्राचीन व्याख्याकार हैं, तथापि 'दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति' के अनेक उदाहरण इनकी टीकाओं में देखने को मिलते हैं, फिर भी उनकी योग्यता के सामने हम नतमस्तक हैं।
अष्टांगहृदय का कलेवर—निर्णयसागरीय अरुणदत्त तथा हेमाद्रि व्याख्या समूलस्तित अष्टांगहृदय की भूमिका की नवीं सूची में इसका उल्लेख विस्तार के साथ किया गया है। तदनुसार इसकी कुल स्थान संख्या ६, अध्याय संख्या १२० तथा श्लोक संख्या प्रायः ७४७ है।
'कीर्तिरक्षरसम्बद्धा स्थिरा भवति भूतले' इस सूक्ति के अनुसार विद्वान् लेखकों की कृतियों ही उन्हें सुदीर्घ काल तक जीवित रखने तथा यशस्वी बनाने में सहायक होती हैं। अतएव विद्वज्जन इस कार्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। इसमें भी प्रकाशकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वे न केवल ग्रन्थ के प्रकाशक होते हैं, अपितु ग्रन्थकार के भी प्रकाशक होते हैं। अन्यथा इनके अभाव में उत्तमोत्तम ग्रन्थों को दीमक चाट जाती है अथवा उन्हें प्राचीन ग्रन्थागारों की कारावास में शरण लेनी पड़ती है।
प्रस्तुत व्याख्या की विशेषता—अष्टांगसंग्रह की विस्तार से रचना करने के बाद जब वाग्भट ने साररूप 'हृदय' की रचना की तो विषयों को संक्षेप में उपस्थित करना आवश्यक हो गया था। व्यास-संक्षेप रचनाचतुर वाग्भट ने इस ग्रन्थ से सम्बन्धित विषयों की पूर्ति कैसे और कहाँ से की होगी, इसका ध्यान रखते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ में जहाँ-जहाँ जो संकेत दिये हैं, उन्हें व्याख्याकाल में सन्दर्भ-संकेत देकर अधिक स्पष्ट कर दिया गया है। इनकी सहायता से विज्ञ पाठक उन विषयों को यथास्थान सरलता से हूँद लेगा। साथ ही स्थान-स्थान पर 'अष्टांगहृदय' के दुरुह विषयों को स्पष्ट करने की दृष्टि से जिन-जिन विषयों को ग्रन्थान्तरों से लिया गया है, उनके भी सन्दर्भ-संकेत यथास्थान दे दिये हैं। मूल ग्रन्थ की टीका के