अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| त्रिफल का वर्णन | ११९ | दोषों को दूषित न करें | १२९ |
| त्रिजात एवं चतुर्जात | ११९ | तीन उपस्तम्भ | १२९ |
| मरिच के गुण | ११९ | आहार नामक उपस्तम्भ | १२९ |
| पिप्ली के गुण | ११९ | निद्रा नामक उपस्तम्भ | १३० |
| सोठ के गुण | ११९ | निद्रा का अभाव | १३० |
| आद्रक के गुण | ११९ | निद्रा के गुण-दोष | १३० |
| त्रिकटु के गुण | ११९ | निद्रा सम्बन्धी विचार | १३० |
| चव्य तथा पीपलमूल | १२० | दिन में न सोने का निर्देश | १३० |
| चित्रक के गुण | १२० | अकालशयन से हानि | १३१ |
| पञ्चकोल के गुण | १२० | चिकित्सा-निर्देश | १३१ |
| बृहत्पञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रानाश के लक्षण | १३१ |
| लघुपञ्चमूल के गुण | १२० | निद्रासेवन-निर्देश | १३१ |
| मध्यमपञ्चमूल के गुण | १२० | पूर्ण निद्राप्राप्ति-विधि | १३१ |
| जीवनपञ्चमूल के गुण | १२० | ब्रह्मचर्य नामक उपस्तम्भ | १३१ |
| तुणपञ्चमूल के गुण | १२१ | स्त्रीसहवास का वर्णन | १३२ |
| ( ७ ) अन्नरक्षाध्यायः | |||
| प्राणाचार्य की नियुक्ति | १२२ | मैथुन के अयोग्य स्थिति | १३३ |
| चिकित्सक का कर्तव्य | १२२ | मैथुन सम्बन्धी अन्य निर्देश | १३३ |
| विषैले भात के लक्षण | १२२ | विपरीत व्यवहार का फल | १३३ |
| विषैले व्यञ्जनों के लक्षण | १२३ | संयम का महत्त्व | १३३ |
| विषैले मांस आदि के लक्षण | १२३ | मैथुनोत्तर कर्तव्य | १३४ |
| विषदाता के लक्षण | १२३ | राजा आदि का कर्तव्य | १३४ |
| विषैले अन्न की परीक्षा | १२४ | ( ८ ) मात्रादशितियाध्यायः | |
| विषैले अन्न का प्रभाव | १२४ | आहारमात्रा का वर्णन | १३५ |
| स्पर्शज विषचिकित्सा | १२४ | मात्रा में गुरु-लघु विचार | १३५ |
| मुख में विष का प्रभाव | १२५ | हीनमात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| आमाशयगत विष के लक्षण | १२५ | अधिक मात्रा वाले आहार से हानि | १३६ |
| पक्वाशयगत विष के लक्षण | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| उक्त दोनों की चिकित्सा | १२५ | अलसक की परिभाषा | १३६ |
| ताम्र एवं स्वर्ण भस्म-प्रयोग | १२५ | विमूचिका की परिभाषा | १३६ |
| स्वर्णभस्म का प्रभाव | १२५ | विमूचिका के लक्षण | १३६ |
| विरोधी आहार | १२६ | अलसक का वर्णन | १३७ |
| आनुपदेशीय मांस | १२६ | दण्डालसक का वर्णन | १३७ |
| दुग्धपान-विचार | १२६ | आमविष का वर्णन | १३७ |
| विरुद्ध द्रव्यों के लक्षण | १२६ | आमदोष की चिकित्सा | १३७ |
| विरोधी आहारों का सेवन | १२८ | पाण्डिदाह-प्रयोग | १३८ |
| अपथ्य का त्याग एवं पथ्य का सेवन | १२९ | अन्य उपचार | १३८ |
| सहसा त्याग का निषेध | १२९ | अपतर्पण-प्रयोग | १३९ |
| दोषों का ह्रास, गुणों की वृद्धि | १२९ | हेतुविपरीत आदि चिकित्सा | १३९ |
| विपरीतार्थकारी चिकित्सा | १३९ |