अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपहले दो से, फिर एक से हृदय रूपी गुफा में स्थित वाणियों को बाहर निकालते हुए तथा अंधकार में प्रकाश की कामना करने वाले बृहस्पति प्रकाशों को प्रकट करते हैं. (४) विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्. बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौ:.. (५) बृहस्पति पुर का विनाश कर के पश्चिम दिशा में सोते हैं. वे सागर के भागों का त्याग नहीं करते तथा आकाश में कड़कते हुए उषा, सूर्य तथा सत्य गौ को प्राप्त करते हैं. (५) इन्द्रो वलं रक्षितारं दुघानां करेणेव वि चकती रवेण. स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानो ऽ रोदयत् पणिमा गा अमुष्णात्.. (६) इंद्र कामधेनुओं के पालक मेघ को छिन्नभिन्न कर देते हैं. उन्होंने दधि की इच्छा से गायों को चुराने वाले पणियों को व्यथित किया था. (६) स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः. ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट्.. (७) इंद्र धन देने वाले तथा धरती को पुष्ट करने वाले मेघों को विदीर्ण करते हैं. ब्रह्मणस्पति आपस में टकराने वाले मेघों के द्वारा धन में व्याप्त होते हैं. (७) ते सत्येन मनसा गोपर्तिं गा इयानास इषणयन्त धीभिः. बृहस्पतिर्मिथोअवद्यपेभिरुदुस्रिया असृजत स्वयुग्भिः.. (८) ये मेघ बैलों और गायों के समीप जाने की कामना करते हुए अपनी वृद्धियों के द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं. शब्द का पालन करते हुए बृहस्पति मेघों के द्वारा गायों से संयुक्त होते हैं. (८) तं वर्धयन्तो मतिभिः शिवाभिः सिंहमिव नानदतं सधस्थे. बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम्.. (९) उस युद्ध में सिंह के समान गर्जन करने वाले बृहस्पति को हम अपनी उत्तम बुद्धियों से बढ़ाते हैं. (९) यदा वाजमसनद् विश्वरूपमा द्यामरुक्षदुत्तराणि सद्म. बृहस्पतिं वृषणं वर्धयन्तो नाना सन्तो बिभ्रतो ज्योतिरासा.. (१०) बृहस्पति देव जिस समय संसार से संबंधित सभी हव्यों का सेवन करते हैं. तब वे आकाश के ऊपर जा कर उत्तम लोकों में प्रतिष्ठा पाते हैं. उस समय शक्ति संपन्न बृहस्पति देव को शेष सभी देव अपने वचनों से उत्साह प्रदान करते हैं. कामनाओं को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*