भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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देता हुआ अपनी पत्नी से कहता है. (८) कतरत् त आ हराणि दधि मन्थां परि श्रुतम्. जायाः पतिं वि पृच्छति राष्ट्रे राज्ञः परिक्षितः.. (९) राजा परीक्षित के राज्य में पत्नी अपने पति से पूछती है कि मैं तेरे लिए थाली में परोसा हुआ कितना दही लाऊं. (९) अभीवस्वः प्र जिहीते यवः पक्वः पथो बिलम्. जनः स भद्रमेधति राष्ट्रे राज्ञः परिक्षितः.. (१०) राजा परीक्षित के राज्य में मनुष्य इस प्रकार सुखी हैं कि उन्हें अपने उदर रूपी बिल को भरने के लिए जौ प्राप्त हो जाता है. (१०) इन्द्रः कारमबूबुधदुत्तिष्ठ वि चरा जनम्. ममेदुग्रस्य चर्कृधि सर्व इत् ते पृणादरिः.. (११) स्तुति करने वालों से इंद्र ने कहा—उठ कर खड़ा हो जा और मनुष्यों में घूम. तू मेरी कृपा से कर्म करने वाला बने. तेरा शत्रु तेरे पास अपना सर्वस्व छोड़ दे. (११) इह गावः प्रजायध्वमिहाश्वा इह पूरुषाः. इहो सहस्रदक्षिणो ऽ पि पूषा नि षीदति.. (१२) यहां मनुष्य और घोड़े उत्पन्न हों तथा गाएं प्रसव करें. हजार संख्या वाली दक्षिणाओं के दाता पूषन यहां विराजमान हों. (१२) नेमा इन्द्र गावो रिषन् मो आसां गोप रीरिषत्. मासाममित्रयुर्जन इन्द्र मा स्तेन ईशत.. (१३) हे इंद्र! ये गाएं नष्ट न हों. इन का पालन करने वाला भी हिंसित न हो. इन पर शत्रु और चोर का कोई प्रभाव न पड़े. (१३) उप नो न रमसि सूक्तेन वचसा वयं भद्रेण वचसा वयम्. वनादधिध्वनो गिरो न रिष्येम कदा चन.. (१४) हे इंद्र! हम तुम्हें सूक्त के द्वारा प्रसन्न करते हैं. तुम हमारी वाणियां अंतरिक्ष में सुनो. हमारा कभी नाश न हो. (१४) सूक्त-१२८ यः सभेयो विदथ्यः सुत्वा यज्वाथ पूरुषः. ebook converter DEMO Watermarks*