भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 1051, कुल 1063 में से

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आलिंगन के समय टूटे हुए दांत और रोम सरोवर में है. (६) सूक्त-१३४ इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अरालागुदभर्त्सथ.. (१) यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए को भयभीत करो. (१) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् वत्साः पुरुषन्त आसते.. (२) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में बालक युवक बनने की इच्छा से बैठे हैं. (२) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स्थालीपाको वि लीयते.. (३) यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए स्थान में स्थालीपाक अर्थात् बटलोई में पकाया हुआ पदार्थ समाप्त हो जाता है. (३) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स वै पृथु लीयते.. (४) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में वह समाप्त हो जाता है. (४) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् आष्टे लाहणि लीशाथी.. (५) यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में युवती जीवन धारण करती है. (५) इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अक्षिलेली पुच्छिलीयते (६) चारों दिशाओं से घिरे इस स्थान में व्यावहारिक बुद्धि पूछी जाती है. (६) सूक्त-१३५ भुगित्यभिगतः शलित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः. दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरो ऽ थामो दैव.. (१) खाने वाला चला गया, गतिशील जीव भाग गया है तथा उसका शरीर रखा है. हे स्तुति करने वालो! तुम इस के बाद दुंदुभि जिन दो डंडों से बजाई जाती है, उस से खेलो. (१) कोशबिले रजनि ग्रन्थेर्धानमुपानहि पादम्. उत्तमां जनिमां जन्यानुत्तमां जनीन् वर्त्मन्यात्.. (२) पैर के जूते में, धान की कुटिया में तथा उत्तम धरती से उत्पन्न पदार्थों को मार्ग में रखो. ebook converter DEMO Watermarks*

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