अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे. तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (६) हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनुपान एवं परिपाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (६) यानसावतिसराँश्चकार कृणवच्च यान्. त्वं तानिन्द्र वृत्रहन् प्रतीचः पुनरा कृधि यथामुं तृणहां जनम्.. (७) हे वृत्र राक्षस का नाश करने वाले इंद्र! हमारे शत्रु ने जिन योद्धाओं को आगे की ओर बढ़ाया है, उन्हें तुम पीछे धकेल दो, जिस से मैं शत्रु की सेना का विनाश कर सकूं. (७) यथेन्द्र उद्वाचनं लब्ध्वा चक्रे अधस्पद्म्. कृण्वे ३ हमधरांस्तथामूञ्छश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) इंद्र ने जिस प्रकार स्तुति वचनों के श्रेष्ठ अस्त्र से अपने शत्रु को पराजित किया था, उसी प्रकार मैं इन शत्रुओं का तिरस्कार करता हूं. (८) अत्रैनानिन्द्र वृत्रहन्नुग्रो मर्मणि विध्य. अत्रैवैनानभि तिष्ठेन्द्र मेद्य१हं तव. अनु त्वेन्द्रा रभामहे स्याम सुमतौ तव.. (९) हे वृत्र को मारने वाले इंद्र! तुम उग्र बन कर इस युद्ध में मेरे शत्रु के मर्मस्थलों का वेध करो. मैं तुम्हारा स्नेहपात्र हूं, इसीलिए तुम मेरे इन शत्रुओं से युद्ध करो. मैं तुम्हारा अनुगामी हूं और भविष्य में भी तुम्हारी सुमति में रहूंगा. (९) सूक्त-९ देवता—वास्तोष्पति दिवे स्वाहा.. (१) द्युलोक के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (१) पृथिव्यै स्वाहा.. (२) पृथ्वी के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (२) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (३) आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (३) अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*