भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 287

ऊर्जां च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु.. (२) हे मरुद्गण! स्वर्ण से बने आभूषण वक्ष स्थल पर धारण कर के तुम जब चलते हो तो जलों को रसमय और ओषधियों को सुखकारी बनाते हो. हे नेता मरुद्गण! तुम जहां पर वर्षा का जल गिराते हो, उस देश में बल कारक अन्न और बुद्धियुक्त प्रजा का पोषण करो. (२) उदप्रुतो मरुतस्ताँ इयर्त वृष्ट्या विश्वा निवतस्पृणाति. एजाति ग्लहा कन्येव तुन्नैरुं तुन्दाना पत्येव जाया.. (३) हे मरुद्गण! तुम जल बरसाने वाले उन मेघों को प्रेरित करो, जिन से संबंधित वर्षा सभी फसलों को और सरिताओं को पुष्ट करती है. जिस प्रकार दरिद्र मातापिता अपनी कन्या को देख कर दुःखी होते हैं, मेघ उसी प्रकार अपनी गर्जना से लोगों को भयभीत और कंपित करते हैं. पत्नी जिस प्रकार पति से बातचीत करती हुई उसे अन्न आदि प्रदान करती है, मेघ गर्जन रूपी वाणी उसी प्रकार गमनशील मेघ से बात करती है. (३) सूक्त-२३ देवता—जल सस्रुषीस्तदपसो दिवा नक्तं च सस्रुषीः. वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये.. (१) उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१) ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्वित्त्वितः प्रणीतये. सद्य कृण्वन्त्वेतवे.. (२) सदैव बहने वाले, लौकिक और वैदिक कर्मों के साधन जल हमें उत्तम फल शीघ्र पाने के लिए सभी पापों से बचाएं. (२) देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः. शं नो भवन्त्वप ओषधीः शिवाः.. (३) प्रकाशित होने वाले एवं सब के प्रेरक सूर्य की प्रेरणा होने पर मनुष्य लौकिक और वैदिक कर्म करे. जल हमारे लिए कल्याणकारी हों और ओषधियां हमारे पापों को शांत करें. (३) सूक्त-२४ देवता—जल हिमवतः प्रस्रवन्ति सिन्धौ समह संगमः. आपो ह मह्यं तद् देवीर्ददन् हृद्द्योतभेषजम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*