भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 1063 में से

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वैश्वानरो न ऊतय आ प्र यातु परावतः. अग्निर्नः सुष्टुतीरुप.. (१) सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारी रक्षा के लिए दूर देश से आएं. वह अग्नि हमारी सुंदर स्तुतियों को ग्रहण करें. (१) वैश्वानरो न आगमदिमं यज्ञं सजूरुप. अग्निरुक्थेष्वंहसु.. (२) सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारे समीप आएं और आ कर हमारे द्वारा की जाती हुई स्तुतियों से प्रसन्न होते हुए इस यज्ञ को स्वीकार करें. (२) वैश्वानरो ऽ ङ्गिरसां स्तोममुक्थं च चाकॢपत्. ऐषु द्युम्नं स्वर्यमत्.. (३) वैश्वानर अग्नि ने महर्षियों द्वारा किए गए स्तोत्रों और शस्त्रों को समर्थ बनाया है तथा प्रसिद्ध यश एवं अन्न प्राप्त कराया है अथवा इन्हें स्वर्ग प्राप्त कराया है. (३) सूक्त-३६ देवता—अग्नि ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिषस्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे.. (१) हम यज्ञात्मक ज्योति के स्वामी एवं सतत दीप्तिशाली वैश्वानर अग्नि की आराधना करते हैं. हम उन से उत्तम फल की याचना करते हैं. (१) स विश्वा प्रति चाकॢप ऋतून्रूतून् सृजते वशी. यज्ञस्य वय उत्तिरन्.. (२) वैश्वानर अग्नि सभी प्रजाओं को सभी फल देने में समर्थ हैं. स्वतंत्र अग्नि सूर्य के रूप में वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करते हैं. वे यज्ञ का अन्न देवों को प्राप्त कराते हैं. (२) अग्निः परेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको वि राजति.. (३) उत्तम स्थानों में अग्नि सम्राट्, भूत और भविष्यत काल में कामनापूर्ण करने वाला हो कर विराजता है. (३) सूक्त-३७ देवता—चंद्रमा ebook converter DEMO Watermarks*