भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 319

नियंता ईश्वर की आज्ञा से जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी अपने स्थान पर स्थित हैं, उन के मध्य में स्थित जगत् भी अपने स्थान पर वर्तमान है. मेरु, मंदार आदि पर्वत भी ईश्वर के द्वारा बनाए गए स्थान पर स्थित हैं. हे नारी! उसी प्रकार मैं तुझे घर की थूनी से बांधता हूं. बांधने का प्रकार वही है, जिस प्रकार घुड़सवार दुष्ट घोड़ों को रस्सी से बांधता है. (१) य उदानट् परायणं य उदान्ण्यायनम्. आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (२) मैं उस देवता का आह्वान करता हूं, जो पीछे गमन करने वालों में व्याप्त है. जो नीचे गमन करने वालों में व्याप्त है और जो भागने वालों के लौटने की गति को रोकता है. (२) जातवेदो नि वर्तय शतं ते सन्त्वावृतः. सहस्रं त उपावृत्तस्ताभिर्नः पुनरा कृधि.. (३) हे जातवेद अग्नि! इस भागने वाली स्त्री को घर में स्थापित करो. तुम्हारे पास इसे लौटाने के सैकड़ों उपाय हैं. तुम इसे मेरे पास लौटाने के लिए हजारों उपाय जानते हो. उन के द्वारा तुम इस स्त्री को पुनः मेरी ओर आकर्षित करो. (३) सूक्त-७८ देवता—चंद्रमा तेन भूतेन हविषा ऽ यमा प्यायतां पुनः. जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम्.. (१) प्रसिद्ध एवं समृद्धि करने वाले हवि से यह पति पुनः प्रजा और पशु आदि से समृद्ध हो. विवाह करने वाले पिता आदि जिस पत्नी को इस के समीप लाए थे, उस पत्नी की दधि, मधु, घृत आदि से हवन किए जाते हुए अग्नि देव वृद्धि करें. (१) अभि वर्धतां पयसा ऽ भि राष्ट्रेण वर्धताम्. रय्या सहस्रवर्चसेमौ स्तामनुपक्षितौ.. (२) यह वर एवं वधू गायों के दूध से समृद्ध हों. इन्हें गायों आदि की समृद्धि प्राप्त हो. ये पतिपत्नी असीमित तेज और धन के द्वारा पूर्ण काम बनें. (२) त्वष्टा जायामजनयत् त्वष्टा ऽ स्यै त्वां पतिम्. त्वष्टा सहस्रमायूंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम्.. (३) हे वर! त्वष्टा देव ने स्त्री को जन्म दिया एवं त्वष्टा ने ही तुम्हें इस स्त्री का पति बनाया है. त्वष्टा देव तुम दोनों अर्थात् पतिपत्नी की हजार वर्षों की दीर्घ आयु प्रदान करें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

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