अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरं योनेरवरं ते कृणोमि मा त्वा प्रजाभि भून्मोत सूनुः. अस्वं १ त्वाप्रजसं कृणोम्यश्मानं ते अपिधानं कृणोमि.. (३) हे मेरे प्रतिकूल रहने वाली नारी! मैं तेरी योनि के भीतर वाले स्थान अर्थात् गर्भाशय को गर्भ धारण के अयोग्य बनाता हूं. इसीलिए तुझे कन्या रूपी संतान भी प्राप्त न हो. तुझे पुत्र संतान भी न मिले. मैं तुझे खच्चरी के समान संतान रहित बनाता हूं. मैं तेरे गर्भाशय को पत्थर से ढकता हूं. (३) सूक्त-३७ देवता—अक्षि, मन अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समञ्जनम्. अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इन्नौ सहासति.. (१) हे पत्नी! मेरी और तेरी आंखें शहद के समान मधुर हों अर्थात् हम एकदूसरे के प्रति अनुरक्त हों. हमारी आंखों का अग्रभाग काजल से युक्त हो. तू मुझे हृदयंगम कर अर्थात् ऐसा प्रयत्न कर, जिस से मैं तेरा प्रिय बन सकूं. हम दोनों का मन समान कार्य करने वाला हो. (१) सूक्त-३८ देवता—वस्त्र अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा. यथा ऽ सो मम केवलॊ नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (१) स्त्री अपने पति से कहती है—हे पति! मैं तुम को अपने मंत्र से युक्त वस्त्र से बांधती हूं. इस प्रकार तुम केवल मेरे ही हो सकोगे तथा दूसरी नारियों का नाम भी नहीं लोगे. (१) सूक्त-३९ देवता—वनस्पति इदं खनामि भेषजं मां पश्यमभिरोरुदम्. परायतो निवर्तनमायतः प्रतिनन्दनम्.. (१) मैं वश में करने वाली इस सौवर्चा नामक जड़ी को खोदता हूं. यह मेरे पति को मेरे अनुकूल बनाए और मेरे पति का अन्य नारियों से संबंध रोके. यह जड़ी मुझे छोड़ कर जाते हुए पति को वापस लाए तथा मेरी ओर आते हुए पति को आनंदित करे. (१) येना निचक्र आसुरीन्द्रं देवेभ्यस्परि. तेना नि कुर्वे त्वामहं यथा ते ऽ सानि सुप्रिया.. (२) असुरों की माया ने जिस जड़ी के बल से इंद्र के अतिरिक्त सभी देवों को युद्ध में अपने अधीन किया था, हे पति! उसी जड़ी के द्वारा मैं तुझे अपने वश में करती हूं. मैं ऐसा इसीलिए