भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 388

सूक्त-५९ देवता—सरस्वती यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद् याचमानस्य चरतो जनाँ अनु. यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद् घृतेन.. (१) मांगने के लिए दाताओं से स्पष्ट बात कहने वाला मेरा जो अंग क्षुब्ध था तथा मांगने के लिए जनजन के समीप मेरा जो अंग व्याकुल था, मेरे शरीर का वह बाधित अंग सरस्वती क्षोभ रहित करें तथा उसे घृत से पूर्ण करें. (१) सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृत्न्र्तानि. उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः.. (२) मरुतों से युक्त एवं जलों के पुत्र वरुण के लिए सात नदियां बहती हैं. द्युलोक में स्थित इंद्र के निमित्त मनुष्य यज्ञ आदि कर्म करते हैं. वे यज्ञकर्म देवों और मानवों के संघ के निवास स्थान होते हैं एवं आकाश और धरती इन देवों और मनुष्यों के ऐश्वर्य बनते हैं. आकाश और धरती इन देवों तथा मनुष्यों के लिए प्रयत्न करते हैं तथा अन्न, जल आदि से पोषण करते हैं. (२) सूक्त-६० देवता—इंद्र, वरुण इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ. युवो रथो अध्वरो देववीतये प्रति स्वसरमुप यातु पीतये.. (१) हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के समीप ले जाए. (१) इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्. इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्.. (२) हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है, इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२) सूक्त-६१ देवता—शत्रु नाशन यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्. वृक्ष इव विद्युता हत आ मूलादनु शुष्यतु.. (१)

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