अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् हमारा वशवर्ती बनाएं. (१) सूक्त-६५ देवता—अग्नि पृतनाजितं सहमानमग्निमुक्थैर्हवामहे परमात् सधस्थात्. स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद् देवो ऽ ति दुरितान्यग्निः.. (१) संग्राम में शत्रुओं को जीतने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं अरणि रूपी उत्तम स्थान से जन्म लेने वाले अग्नि का आह्वान हम मंत्रों के द्वारा करते हैं. वह हमारे सभी कष्टों का विनाश करें. दीप्ति वाले अग्नि हमारे सभी पापों को दग्ध करें. (१) सूक्त-६६ देवता—जल, अग्नि इदं यत् कृष्णः शकुनिरभिनिष्पतन्नपीपतत्. आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (१) काले पक्षी अर्थात् कौए ने आकाश से नीचे आते हुए, जो पंखों से मेरे अंग पर चोट की है, उस से होने वाले समस्त पापों से अभिमंत्रित जल मेरी रक्षा करे. (१) इदं यत् कृष्णः शकुनिरवामृक्षन्निर्ऋते ते मुखेन. अग्निर्मा तस्मादेनसो गार्हपत्यः प्र मुञ्चतु.. (२) हे मृत्युदेवता! काले पक्षी अर्थात् कौए ने जो अपने मुख से मेरे अंग को स्पर्श किया है, उस से होने वाले पाप से मुझे गार्हपत्य नामक अग्नि बचाएं. (२) सूक्त-६७ देवता—अपामार्ग प्रतीचीनफलो हि त्वमपामार्ग रुरोहिथ. सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया इतः.. (१) हे अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तुम सामने की ओर मुख वाले फलों के रूप में उगे हो, इस कारण मेरे सभी दोषों को मुझ से अत्यधिक दूर करो. (१) यद् दुष्कृतं यच्छमलं यद् वा चेरिम पापया. त्वया तद् विश्वतोमुखापामार्गाप मृज्महे.. (२) हमने जो दुष्कर्म, पाप एवं मलिन आचरण किया है, हे सभी ओर शाखाओं वाले अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा हम उसे दूर करते हैं. (२) श्यावदता कुनखिना बण्डेन यत्सहासिम. ebook converter DEMO Watermarks*