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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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अयं मणिः सपत्नहा सुवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः. प्रत्यक् कृत्या दूषयन्नेति वीरः.. (२) तिलक वृक्ष से निर्मित मणि शत्रु घातक, संतान देने वाली, शक्तिशालिनी, वेगवती, शत्रुओं को पराजित करने वाली, उग्र तथा दूसरे के द्वारा भेजी गई कृत्या राक्षसी को उसी के विरोध में भेजने वाली है. शत्रुओं को अनेक प्रकार से दूषित करने वाली यह मणि हमारे सामने आती है. (२) अनेनेन्द्रो मणिना वृत्रमहन्नेनासुरान् पराभावयन्मनीषी. अनेनाजायद् द्यावापृथिवी उभे इमे अनेनाजयत् प्रदिशश्चतस्रः.. (३) किसी भी उपाय से वृत्रासुर को मारने में असफल होने पर इंद्र ने इसी मणि को बांधने के प्रभाव से विजय के उपाय जाने एवं राक्षसों को पराजित एवं नष्ट किया था. इंद्र ने इसी मणि के प्रभाव से धरती और आकाश पर विजय प्राप्त की है. इसी मणि के प्रभाव से इंद्र ने पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण-चारों दिशाओं को जीता है. (३) अयं स्रक्त्यो मणिः प्रतीवर्तः प्रतिसरः. ओजस्वान् विमृधो वशी सो अस्मान् पातु सर्वतः.. (४) तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि, विरोधियों को लौटाने वाली तथा रोग आदि का विनाश करने वाली है. शत्रु विनाशक तेज से युक्त, शत्रुओं को भगा कर युद्ध का अभाव करने वाली एवं सब को वश में करने वाली यह मणि सभी से हमारी रक्षा करे. (४) तदग्निराह तदु सोम आह बृहस्पतिः सविता तदिन्द्रः. ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (५) उस अग्नि देव ने कृत्या राक्षसी को वापस लौटाने वाली मणि के विषय में मुझे बताया है. सोम, बृहस्पति, सविता एवं इंद्र ने भी मणि के विषय में यही कहा है. अन्य प्रसिद्ध देवों एवं पुरोहितों ने भी इस मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस लौटाया है. (५) अन्तर्दधे द्यावापृथिवी उताहरुत सूर्यम्. ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (६) मैं धरती और आकाश को तथा दिवस और सूर्य को अपने तथा कृत्या राक्षसी के मध्य में स्थापित करता हूं. धरती, आकाश आदि देव एवं यजमान को कृत्या से बचाने वाले पुरोहित तिलक वृक्ष से मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस करें. (६) ये स्रक्त्यं मणिं जना वर्मणि कृण्वते. सूर्य इव दिवमारुह्य वि कृत्या बाधते वशी.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*