भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 1063 में से

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कृत्या राक्षसी से बचाने वाले लोग तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को अपना कवच बना लेते हैं. यह मणि दूसरे द्वारा भेजी गई कृत्या का उसी प्रकार विनाश करती है, जिस प्रकार सूर्य आकाश में पहुंच कर अंधकार का विनाश करते हैं. (७) साक्त्येन मणिन ऋषिरणेव मनीषिणा. अजैषं सर्वाः पृतना वि मृधो हन्मि रक्षसः.. (८) मुझ साधक ने तिलक वृक्ष द्वारा निर्मित मणि की सहायता से पूतना नामक सभी राक्षसियों को उसी प्रकार जीत लिया है, जिस प्रकार विद्वान् ऋषि अथवा ने जीता था. मैं उपद्रवकारी राक्षसों को तिलक वृक्ष से निर्मित मणि के द्वारा नष्ट करता हूं. (८) याः कृत्या आङ्गिरसीर्याः कृत्या आसुरीर्याः कृत्याः स्वयंकृता या उचान्येभिराभृताः. उभयीस्ताः परा यन्तु परावतो नवतिं नाव्‍या ३ अति.. (९) जो कृत्या राक्षसियां अंगिरा ऋषि द्वारा बताई हुई विधि से प्रयुक्त हैं, जो कृत्या राक्षसियां असुरों द्वारा निर्मित हैं, जो कृत्या राक्षसियां चित्त विकलता के कारण किसी के द्वारा अपने ऊपर की गई हैं अथवा अन्य अभिचारकों द्वारा की गई हैं, ये दोनों प्रकार की कृत्याएं दूर चली जाएं. कृत्याएं नौ नदियों के पार चली जाएं. (९) अस्मै मणिं वर्म बध्नन्तु देवा इन्द्रो विष्णुः सविता रुद्रो अग्निः. प्रजापतिः परमेष्ठी विराट् वैश्वानर ऋषयश्च सर्वे.. (१०) इंद्र, विष्णु, सविता, रुद्र एवं अग्नि कृत्या से बचने के इच्छुक इस यजमान को कवच के स्थान पर तिलक वृक्ष से निर्मित मणि बांधें अथवा सर्वोच्च स्थान पर विराजमान प्रजापति एवं सभी ऋषि यजमान की रक्षा के लिए यह मणि बांधें. प्रजापति संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी तथा सभी मनुष्यों के हितकारी हिरण्यगर्भ हैं. (१०) उत्तमो अस्योषधीनामनड्वाञ्जगतामिव व्याघ्रः श्वपदामिव. यमैच्छामाविदाम तं प्रतिस्पाशनमन्तितम्.. (११) हे मणि के उपादान तिलक वृक्ष! तू सभी वृक्षों में उत्तम है, क्योंकि अन्य वृक्ष सीमित फल के साधक हैं और तू समस्त अभिमत फल देने वाला होने के कारण उसी प्रकार श्रेष्ठ है, जिस प्रकार बैल पालतू चौपायों में और बाघ हिंसक जंगली पशुओं में श्रेष्ठ है. हम ने जिस की इच्छा की थी, उसे तेरी सहायता से पा लिया. मेरी इच्छित वस्तु विरोधी अभिचारक की बाधक एवं मेरे अत्यंत समीप रहने वाली है. (११) स इद् व्याघ्रो भवत्यथो सिंहो अथो वृषा. अथो सपत्नकर्शनो यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*