अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वन्:. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (९) जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (९) सूक्त-४ देवता—जल अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्. पृंचतीर्मधुना पय:.. (१) यज्ञ करने के इच्छुक जन अपनी माताओं और बहनों के समान जल, सोमरस, दूध एवं घृत आदि यज्ञ सामग्री ले कर आते हैं. (१) अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्य: सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२) जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए. (२) अपो देवीरुप ह्वये यत्र गाव: पिबन्ति न:. सिन्धुभ्य: कृत्वं हवि:.. (३) मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं. जल से पूर्ण जलाशयों अर्थात् नदियों और तालाबों में हमारी गाएं जल पीती हैं. (३) अप्स्व १ न्तरमृतमप्सु भेषजम्. अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनी:.. (४) जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें. (४) सूक्त-५ देवता—जल आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१) हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें. (१) यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:. उशतीरिव मातर:.. (२) जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी ebook converter DEMO Watermarks*