भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं. (४) सूक्त-२३ देवता—वनस्पति नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च. इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्.. (१) हे हरिद्रा! हल्दी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो. (१) किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत्. आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय.. (२) हे ओषधि! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे. (२) असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव. असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत्.. (३) हे नील नामक ओषधि! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर. (३) अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यत् त्वचि. दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम्.. (४) हड्डियों से उत्पन्न, त्वचा से उत्पन्न एवं इन दोनों के मध्यवर्ती मांस से उत्पन्न कुष्ठ रोग के कारण जो श्वेत चिह्न शरीर पर उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें मैं मंत्र के प्रभाव से नष्ट करता हूं. (४) सूक्त-२४ देवता—आसुरी वनस्पति सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तम् आसिथ. तद् आसुरी युधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन्.. (१) हे ओषधि! सब से पहले गरुड़ उत्पन्न हुए. तू उन के शरीर में पित्त दोष के रूप में थी. ebook converter DEMO Watermarks*