अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextविमृग्वरीं पृथिवीमा वदामि क्षमां भूमिं ब्रह्मणा वावृधानाम्. ऊर्जं पुष्टं बिभ्रतीमन्नभागं घृतं त्वाभि नि षीदेम भूमे.. (२९) धर्मरूपिणी, परम पवित्रा तथा मंत्रों के द्वारा बढ़ने वाली पृथ्वी की मैं स्तुति करता हूं. हे पृथ्वी! तू पोषक अन्न और बल को धारण करने वाली है. मैं तुझ पर घृत की आहुति देता हूं. (२९) शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं नि दध्मः. पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि.. (३०) पवित्र जल हमारी देह को सींचे. हमारे शरीर पर हो कर जाने वाले जल शत्रु को प्राप्त हों. हे पृथ्वी! मैं अपनी देह को पवित्र जल के द्वारा पवित्र करता हूं. (३०) यास्ते प्राचीः प्रदिशो या उदीचीर्यास्ते भूमे अधराद् याश्च पश्चात्. स्योनास्ता मह्यं चरते भवन्तु मा नि पप्तं भुवने शिश्रियाणः.. (३१) हे पृथ्वी! तुम्हारी पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम रूप चारों दिशाएं मुझे विचरण की शक्ति प्रदान करें. इस लोक में रहता हुआ मैं गिरने न पाऊं. (३१) मा नः पश्चान्मा पुरस्तान्नुदिष्ठा मोत्तरादधरादुत. स्वस्ति भूमे नो भव मा विदन् परिपन्थिनो वरीयो यावया वधम्.. (३२) हे पृथ्वी! तू मेरे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों ओर खड़ी रहे. मुझे दस्यु प्राप्त न करे. तू विशाल हिंसा से मुझे बचाती हुई मंगल करने वाली हो. (३२) यावत् ते ऽ भि विपश्यामि भूमे सूर्येण मेदिना. तावन्मे चक्षुर्मा मेष्टोत्तरामुत्तरां समाम्.. (३३) मैं जब तक तुझे सूर्य के सामने देखता रहूं, तब तक मेरे देखने की शक्ति नष्ट न हो. (३३) यच्छयानः पर्यावर्ते दक्षिणं सव्यमभि भूमे पार्श्वम्. उत्तानास्त्वा प्रतीचीं यत् पृष्टीभिरधिशेमहे. मा हिंसीस्तत्र नो भूमे सर्वस्य प्रतिशीवरि.. (३४) हे पृथ्वी! सोता हुआ मैं करवट लूं अथवा सीधा हो कर सोऊं, उस समय कोई मेरी हिंसा न करे. (३४) यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु. मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्.. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*