अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे पृथ्वि! मैं तेरे जिस स्थल को खोदूं वह शीघ्र ही पहले जैसा हो जाए. मैं तेरे मर्म को पूर्ण करने में समर्थ नहीं हूं. (३५) ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि शरद्धेमन्तः शिशिरो वसन्तः. ऋतवस्ते विहिता हायनीरहोरात्रे पृथिवि नो दुहाताम्.. (३६) हे पृथ्वि! ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत—ये छह ऋतुएं तथा दिन, रात और वर्ष—ये सब हम को फल देने वाले हों. (३६) याप सर्पं विजमाना विमृग्वरी यस्यामासन्नग्नयो ये अप्स्व१न्तरः. परा दस्यून् ददती देवपीयूनिन्द्रं वृणाना पृथिवी न वृत्रम्. शक्राय दध्रे वृषभाय वृष्णे.. (३७) जो पृथ्वी सूर्य के हिलने पर कांपती है, विद्युत के रूप में जल में रहने वाली अग्नि जिस पृथ्वी में भी निवास करती है, जिस ने वृत्रासुर को त्याग कर इंद्र का वरण किया था, जो देव हिंसकों के लिए फल देने वाली नहीं होती तथा जो पुष्ट और शक्तिशाली पुरुष के अधीन रहती है. (३७) यस्यां सदोहविर्धाने यूपो यस्यां निमीयते. ब्रह्माणो यस्यामर्चन्त्यृग्भिः साम्ना यजुर्विदः. युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे.. (३८) जिस पृथ्वी पर यज्ञ मंडप की रचना होती है, जिस पर यूप खड़े किए जाते हैं. जिस पृथ्वी पर ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा देव पूजन और इंद्र को सोमपान कराने का कार्य होता है. (३८) यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः. सप्त सत्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह.. (३९) जिस पृथ्वी पर प्राणियों की रचना करने वाले ऋषियों ने सप्त सूत्रों वाले ब्रह्मयोग और स्तुति रूपी वाणियों से देव पूजन किया था. (३९) सा नो भूमिरा दिशतु यद्धनं कामयामहे. भगोः अनुप्रयुङ्क्तामिन्द्र एतु पुरोगवः.. (४०) वह भूमि हमारा चाहा हुआ धन प्रदान करे. भग हम को प्रेरणा देने वाले हों तथा इंद्र हमारे आगे चलने वाले हों. (४०) यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः. युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः. ebook converter DEMO Watermarks*