अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मा पृथिवी कृणोतु.. (४१) जिस पृथ्वी पर मनुष्य नाचते और गाते हैं, जिस पर रुदन होता है और दुंदुभि बजती है, वह पृथ्वी मुझे शत्रुहीन बनाए. (४१) यस्यामन्नं व्रीहियवौ यस्या इमाः पञ्च कृष्टयः. भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोऽस्तु वर्षमेदसे.. (४२) जिस पृथ्वी पर गेहूं और जौ जैसे अन्न पैदा होते हैं, जिस पर पांच प्रकार की खेतियां होती हैं, वर्षा द्वारा पुष्ट की जाने वाली पृथ्वी को नमस्कार है. (४२) यस्याः पुरो देवकृताः क्षेत्रे यस्या विकुर्वते. प्रजापतिः पृथिवीं विश्वगर्भामाशामाशां रण्यां नः कृणोतु.. (४३) देवताओं द्वारा बनाए गए हिंसक पशु जिस पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रीड़ाएं करते हैं, जो पूरे संसार को अपने में धारण करती है, उस पृथ्वी की दिशाओं को प्रजापति हमारे लिए मंगलमय करें. (४३) निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु मे. वसूनि नो वसुदा रासमाना देवी दधातु सुमनस्यमाना.. (४४) निधियों को धारण करने वाली पृथ्वी मुझे गुफा, स्वर्ण, मणि आदि धन प्रदान करे. धन प्रदान करने वाली पृथ्वी हम पर प्रसन्न होती हुई वरदायिनी बने. (४४) जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम. सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती.. (४५) अनेक धर्मों और अनेक भाषाओं वाले मनुष्यों को धारण करने वाली पृथ्वी अडिग धेनु के समान मेरे लिए धन की हजारों धाराओं को दुहाए. (४५) यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंश्मा हेमन्तजब्धो भृमलो गुहा शये. क्रिमिर्जिन्र्वत् पृथिवि यद्यदेजति प्रावृषि तन्नः सर्पन्मोप सृपद् यच्छिवं तेन नो मृड.. (४६) हे पृथ्वी! तुम में जो सर्प निवास करते हैं, उन का दंश प्यास लगाने वाला है. तुम में जो बिच्छू हैं, वे हेमंत ऋतु में डंक नीचे किए हुए गुफा में शयन करते हैं. वर्षा ऋतु में प्रसन्नता पूर्वक विचरण करने वाले ये प्राणी अर्थात् सांप और बिच्छू मेरे समीप न आएं. (४६) ये ते पन्थानो बहवो जनायना रथस्य वर्त्मानसच्व यातवे. यैः संचरन्त्युभये भद्रपापास्तं पन्थानं जयेमानमित्रमतस्करं यच्छिवं तेन ebook converter DEMO Watermarks*