अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंनप गए हैं. इन्हें जल में डालने की अनुज्ञा प्रदान कर. (३०) प्र यच्छ पर्शुं त्वरया हरौषमहिंसन्त ओषधीर्दान्तु पर्वन्. यासां सोमः परि राज्यं बभूवामन्युता नो वीरुधो भवन्तु.. (३१) कलछी को चलाओ और जो चावल पक चुके हैं, उन्हें ले लो. ये किसी की हिंसा न करते हुए प्रत्येक पर्व में ओषधि रूपी फल प्राप्त करें. जिन लताओं का राजा सोम है, ये लताएं मोक्ष करने वाली हों. (३१) नवं बर्हिरोदनाय स्तृणीत प्रियं हृदश्वक्षुषो वल्ववस्तु. तस्मिन् देवाः सह दैवीर्विशन्तिवमं प्राश्नन्त्वृतुभिर्निषद्य.. (३२) ओदन रखने के लिए नवीन कुशा फैला दो. यह कुशा का आसन हृदय और नेत्रों को सुंदर लगे. देवता उस पर अपनी पत्नियों सहित विराजमान होते हुए इस ओदन का सेवन करें. (३२) वनस्पते स्तीर्णमा सीद बर्हिरग्निष्टोमैः संमितो देवताभिः. त्वष्ट्रेव रूपं सुकृतं स्वधित्दैना एहाः परि पात्रे ददृश्राम्.. (३३) हे वनस्पति! कुशा बिछा दी है. तुम उस पर बैठो. देवताओं ने तुम्हें अग्नि सोम के समान समझा है. स्वधिति ने उसे त्वष्टा के समान शोभन रूप दिया है. वह अब पात्रों में दिखाई देता है. (३३) षष्ट्यां शरत्सु निधिपा अभीच्छात् स्वः पक्वेनाभ्यश्ववातै. उपैनं जीवन् पितरश्च पुत्रा एतं स्वर्गं गमयान्तमग्नेः.. (३४) इस निधि का रक्षक यजमान इस पके हुए ओदन के भक्षण का फल स्वर्ग में साठ वर्ष पश्चात प्राप्त करे. हे यश के अभिमानी देव! तुम इस यजमान को स्वर्ग प्राप्त कराते हुए इस के पितरों, पुत्र आदि को भी इस के समीप रखो. (३४) धर्ता ध्रियस्व धरुणे पृथिव्या अच्युतं त्वा देवताश्च्यावयन्तु. तं त्वा दम्पती जीवन्तौ जीवपुत्रावुद् वासयातः पर्यग्निधानात्.. (३५) हे ओदन! तू धारण करने वाला है. इसलिए भूमि के स्थान में प्रतिष्ठित हो. तू अच्युत है, देवता तुझे च्युत न करें. जीवित पुत्रों वाले पतिपत्नी तुझे धान के द्वारा पुष्ट करें. (३५) सर्वान्त्समागा अभिजित्य लोकान् यावन्तः कामाः समतीतृपस्तान्. वि गाहेथामायवनं च दविरिकस्मिन् पात्रे अध्युद्धरैनम्.. (३६) हे ओदन! तू सभी लोकों पर विजय प्राप्त करता हुआ आ. तू हमारी सभी इच्छाओं को ebook converter DEMO Watermarks*