भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 1063 में से

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पूरी तरह तृप्त कर. कलछी को घुमाते हुए पतिपत्नी ओदन को निकाल कर पात्र में स्थित करें. (३६) उप स्तृणीहि प्रथय पुरस्ताद् घृतेन पात्रमभि धारयैतत्. वाश्रेवोस्त्रा तरुणं स्तनस्युमिमं देवासो अभिहिङ्कृणोत.. (३७) तुम इसे परोस कर फैलाओ तथा इस में घी डालो. हे देवगण! दूध पीने वाले को देख कर दुधारू गाएं दूध पीने वाले बछड़े को देखकर शब्द करती हुई जिस प्रकार उस की ओर दौड़ती हैं, उसी प्रकार इस तैयार ओदन की ओर तुम शब्द करो. (३७) उपास्तरीकरो लोकमेतमुरुः प्रथतामसमः स्वर्गः. तस्मिञ्छ्रयातै महिषः सुपर्णो देवा एनं देवताभ्यः प्र यच्छान्.. (३८) हे यजमान! ओदन परोस कर तुम ने इस लोक को वश में कर लिया है. उस के प्रभाव से स्वर्ग के यही ओदन तुझे अधिक बढ़े हुए प्राप्त हों. हे पति और पत्नी! यह सुंदर महिमा वाला और गमनशील ओदन तुम्हें स्वर्ग को प्राप्त कराए. देवता इस यजमान को देवों के समीप पहुंचा दें. (३८) यद्यज्जाया पचति त्वम् परः परः पतिर्वा जाये त्वत् तिरः. सं तत् सृजेथां सह वां तदस्तु संपादयन्तौ सह लोकमेकम्.. (३९) हे जाया! तू इस ओदन को पकाती है. यदि तू अपने पति से पहले चली जाए तो तुम दोनों स्वर्ग में मिल जाना. तुम दोनों एक लोक में रहो तथा यह ओदन भी वहां तुम्हारे पास रहे. (३९) यावन्तो अस्याः पृथिवीं सचन्ते अस्मत् पुत्राः परि ये संबभूवुः. सर्वांस्तां उप पात्रे ह्रयेथां नाभिं जानानाः शिशवः समायान्.. (४०) हे यजमान! तुम अपनी पत्नी और सब पुत्रों को इस पात्र के पास बुलाओ. वे बालक अपनी नाभि (केंद्र) को जानते हुए यहां आएं (४०) वसोर्या धारा मधुना प्रपीना घृतेन मिश्रा अमृतस्य नाभयः. सर्वास्ता अव रुन्धे स्वर्गः षष्ट्यां शरत्सु निधिपा अभीच्छात्.. (४१) वसुयुक्त ओदन की मधु के द्वारा मोटी बनी हुई धाराएं घी से मिली हुई हैं. स्वर्ग अमृत की थाली के समान है. स्वर्ग इन को रोकता है. वसु की धाराएं निधि की रक्षक हैं. मनुष्य साठ वर्ष की अवस्था में इन की इच्छा करे. (४१) निधिं निधिपा अभ्येनमिच्छादनीश्वरा अभितः सन्तु ये ३ न्ये. अस्माभिर्दत्तो निहितः स्वर्गस्त्रिभिः काण्डैस्त्रीन्त्स्वर्गानिरुक्षत्.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*