भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 665

ततो ऽ परूपं जायते तस्माद्व्येष्यदेनसः.. (९) यदि गाय के गोबर आदि को दासी फेंकती है तो गाय का स्वामी उस पाप से नहीं छूट पाता तथा कुरूप हो जाता है. (९) जायमानाभि जायते देवान्त्सब्राह्मणान् वशा. तस्माद् ब्रह्मभ्यो देयैषा तदाहुः स्वस्य गोपनम्.. (१०) वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय देवताओं और ब्राह्मणों के लिए ही प्रकट होती है. इसलिए ब्राह्मणों को उस का दान देना ही अपनी रक्षा करना है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं. (१०) य एनां वनिमायन्ति तेषां देवकृता वशा. ब्रह्मज्येयं तदब्रुवन् य एनां निप्रियायते.. (११) जो लोग गाय को परम प्रिय समझते हुए उस की सेवा करते हैं उन के लिए यह ब्रह्मज्या होती है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (११) य आर्षेयेभ्यो याचद्भ्यो देवानां गां न दित्सति. आ स देवेषु वृश्चते ब्राह्मणानां च मन्यवे.. (१२) जो देवताओं की गाय को ऋषि पुत्रों वाले ब्राह्मणों को नहीं देना चाहता है, वह ब्रह्म कोप के कारण देवताओं के द्वारा नाश को प्राप्त होता है. (१२) यो अस्य स्याद् वशा ऽ भोगो अन्यामिच्छेत तर्हि सः. हिंस्ते अदत्ता पुरुषं याचितां च न दित्सति.. (१३) यदि वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय उस के स्वामी के लिए उपभोग योग्य हो तो वह अन्य गाय की कामना करे. जो पुरुष याचक को वशा गाय का दान नहीं देता है तो यह दान न की हुई वशा गौ उसे नष्ट कर देती है. (१३) यथा शेवधिर्निहितो ब्राह्मणानां तथा वशा. तामेतदच्छायन्ति यस्मिन् कस्मिंश्च जायते.. (१४) वशा गाय ब्राह्मणों की धरोहर के समान होती है. यह गाय वास्तव में ब्राह्मणों की ही है. वह चाहे जिस के घर में प्रकट हो जाए, ये ब्राह्मण गोस्वामी के सामने आ कर इस गाय को मांगते हैं. (१४) स्वमेतदच्छायन्ति यद् वशां ब्राह्मणा अभि. यथैनानन्यस्मिन् जिनीयादेवास्या निरोधनम्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*