अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 668, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ें(२८) वशा चरन्ती बहुधा देवानां निहितो निधिः. आविष्कृणुष्व रूपाणि यदा स्थाम जिघांसति... (२९) देवताओं की निधि रूप वशा अनेक प्रकार से विचरण करती हुई जब स्थान को नष्ट करना चाहती है, तब विभिन्न रूपों को प्रकट करती है. (२९) आविरात्मानं कृणुते यदा स्थाम जिघांसति. अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याच्याय कृणुते मनः... (३०) जब वशा अपने स्थान का नाश करने की इच्छा करती है, तब वह ब्राह्मणों के द्वारा मांगे जाने की इच्छा करती हुई अनेक रूपों को प्रकट करती है. (३०) मनसा सं कल्पयति तद् देवाँ अपि गच्छति. ततो ह ब्रह्माणो वशामुपप्रयन्ति याचितुम्... (३१) वशा जब इच्छा करती है, तब उस की इच्छा देवताओं के पास जाती है. तब ब्राह्मण वशा को मांगने के लिए उस के पास आते हैं. (३१) स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन देवताभ्यः. दानेन राजन्यो वशाया मातुर्हेडं न गच्छति... (३२) पितरों के लिए स्वधा करने से, देवताओं के विभिन्न यज्ञ करने से तथा वशा का दान करने से क्षत्रिय अपनी माता का क्रोध प्राप्त नहीं करता है. (३२) वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः. तस्या आहुरनर्पणं यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते.. (३३) वशा क्षत्रिय की माता है. वशाओं का समूह पहले प्रकट हुआ था. ब्राह्मणों को वशा का दान करने से पहले उस वशा को अनर्पण अर्थात् अर्पण न की हुई कहा जाता है. (३३) यथाज्यं प्रगृहीतमालुम्पेत् स्रुचो अग्नये. एवा ह ब्रह्मभ्यो वशामग्नय आ वृश्चते ऽ ददत्.. (३४) ग्रहण किया हुआ घृत जिस प्रकार स्रुवा से अग्नि के लिए पृथक् होता है, उसी प्रकार अग्नि का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के लिए वशा का दान करना चाहिए. (३४) पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोके ऽ स्मा उप तिष्ठति. सास्मै सर्वान् कामान् वशा प्रददुषे दुहे... (३५) ebook converter DEMO Watermarks*